उघड़ती परतें, धूमिल होता सच

बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना संदेह के घेरे में है और इसके पीछे का सच अभी उजागर होना बाकी है

संजय कपूर
तेरह साल पहले जब बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ तो यह मेरे लिए अविश्वसनीय था कि विश्व हिंदू परिषद के कुछ आक्रमणकारियों ने कैसे त्रिशूल और गैंती की सहायता से इतना मजबूत ढांचा ढहा दिया. यदि सौ की संख्या में कुछ लोग ताजमहल पर चढ़ जाएंगें तो क्या वे सिर्फ गैंती की सहायता से उसके विशाल गुंबद को कुछ घंटों में नीचे गिरा देंगे? जिस तरीके से इस इमारत को गिराया गया, जैसे कि इसके गुंबद, पिलर और फिर पूरा ढांचा ढेर में तब्दील हो गया, यह साफतौर पर इशारा करता है कि जो कुछ भी सीबीआई ने जांच की और मीडिया में रिपोर्ट आई उससे मामला कुछ अलग ही था.

कुछ समय के लिए यदि हम विश्वास कर लें कि, इस पुरानी इमारत को गिराने में एक बड़ा षड़यंत्र रचा गया और यह केवल भीड़ का सामूहिक काम नहीं था तो यहां यह स्पष्ट रूप से इस पूरे मामले के पीछे कोई मास्टरमाइंड काम कर रहा था. इस षड़यंत्र में इस स्तर पर मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश की गई कि किसी भी जांच को प्रभावित किया जा सके.

अभी कुछ समय पहले मैं एक अनिवासी भारतीय से मिला. उसने इस षड़यंत्र के बारे में कुछ तथ्य मुझे बताए जो बीजेपी और उसके अनुषांगिक संगठनों की ओर इशारा कर रहे थे. उसने जो बताया उसके अनुसार मस्जिद को विस्फोटकों का इस्तेमाल कर उड़ा दिया गया.

विदेशी विशेषज्ञों के अनुसार, इस इमारत को ढेर में बदलने में विस्फोटकों का इस्तेमाल बड़े ही रणनीतिक स्तर पर किया गया जो रिमोट द्वारा संचालित हुआ. यह इस बात का सबूत है कि ढांचा ढहाने के समय लोगों ने धमाके की आवाजें सुनीं.

ढांचा गिरने के कुछ समय पहले अशोक सिंघल को कार सेवकों को गुंबद गिराने के लिए उकसाते हुए देखा गया. इससे यह प्रमाण मिलता है कि उन्हें पहले से इसकी जानकारी थी. इतने भारी गुंबद के गिरने के बाद कुछ ही लोगों के मरने की खबरें आईं जिससे यह प्रमाण पुख्ता होता है.

मेरे एनआरआई सूत्र ने बताया कि इस काम के लिए विदेशी विशेषज्ञों ने १९९२ में दो बार भारत का दौरा किया था, उनका पहला दौरा १ अगस्त तथा दूसरा १ दिसंबर को हुआ. पहली बार वह दिल्ली के ली मैरेडियन होटल में ठहरे तथा दूसरी बार वे एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल के साथ आए. विध्वंश की घटना को अंजाम देने वाले ये लोग चोरी छिपे राजधानी से बाहर गए और उन्होंने अयोध्या का दौरा कर विस्फोटक लगाने की परिस्थितियों का गहन जायजा लिया. उसके कुछ ही दिन बाद मस्जिद का विध्वंश हो गया.

ये सारी जानकारियां अपने आप में पर्याप्त नहीं थीं. कुछ महीनों के बाद मैं एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी से मिला जिसके पास उन भयावह दिनों की उस समय खुफिया जानकारी थी, कि मस्जिद को नुकसान पहुंचाया जा सकता है. उन्होंने बताया कि सरकार और न्यायपालिका ने इसकी सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया. यह अधिकारी बाद में प्रधानमंत्री से मिला लेकिन राव इसमें कुछ भी करने में विफल रहे.

मस्जिद गिराए जाने से एक दिन पहले कार सेवा व उनकी संख्या को नियंत्रित करने के लिए रणनीति बनी थी. इसके पीछे विचार यह था कि यदि कुछ सौ लोग मस्जिद में प्रवेश कर गए तो उन्हें नियंत्रित करना आसान होगा लेकिन यदि इनकी संख्या हजारों में हुई तो कुछ भी हो सकता है. इस बारे में एक जनहित याचिका दायर हुई लेकिन उसे संज्ञान में नहीं लिया गया.

इस अधिकारी ने यह भी बताया कि जिस देश का मेरा एनआरआई मित्र था वहां का एक प्रतिनिधिमंडल दिसंबर के महीने में भारत का दौरा किया और संभवतः वह और कहीं भी गया था. वास्तव में इसका क्या मतलब है? क्या बीजेपी का मस्जिद विध्वंस में हाथ नहीं था? क्या अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी और एलके आडवाणी निर्दोश हैं?

चूंकि मामला न्यायालय में है इसलिए इन पर दोषारोपण करना ठीक नहीं होगा. लेकिन एक व्यक्ति जो इस पूरे षड़यंत्र को अच्छी तरह से समझता था, वह प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव थे, जो इस घटना के समय आंख मूंदे रहे. इस पूरे प्रकरण में एक बड़ा सवाल यह है कि, क्या नरसिंह राव जानते थे कि बाबरी मस्जिद ढांचा ढहा दिया जाएगा? यदि मेरा एनआरआई सूत्र और उस सेवानिवृत्त अधिकारी की बातों में सत्यता है तो यह सब नरसिंह राव की अस्थियों के साथ ही समाप्त हो गया है.

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