दक्षिण अफ्रीकाः एड्स की महामारी

दक्षिण अफ्रीका एचआईवी से ग्रसित लोगों की संख्या व महिला हिंसा के मामले में सबसे आगे है. देश में व्याप्त इन चुनौतियों से निबटने की बजाय राष्ट्रपति थाबो मबेकी उन पर निशाना साध रहे हैं जो देश की समस्याओं पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं,

चार्लिन स्मिथ
सिंडिस्वी म्बांडल्वा एक २३ वर्षीय युवती है जिसे बार बार बलात्कार का शिकार होना पड़ा है. सबसे ज्यादा शर्मसार कर देने वाली बात यह है कि उन बलात्कारियों में खुद उसका दादा भी था. एक अनुमान के अनुसार दक्षिण अफ्रीका में बलात्कार की शिकार ४० फीसदी युवतियां एड्स की शिकार हो चुकी हैं, जाहिर है म्बांडल्वा भी इससे अछूती नहीं और वह भी एचआईवी से ग्रसित है.

बलात्कार की शिकार होने के बाद भी उसे एड्स से बचाव की दवा नहीं दी गई जबकि वहां की सरकार ने इसे उपलब्ध कराने का वादा किया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन व यूएनएड्स का अनुमान है कि उपसहारा अफ्रीका में एचआईवी की ऊंची दर का प्राथमिक कारण सेक्स हिंसा है. दक्षिण अफ्रीका में संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यवेक्षक स्टीफेन लेविस ने स्वाजीलैंड से लौटने के बाद जो सांख्यिकीय आंकड़े प्रस्तुत किए वे काफी चौंकाने वाले हैं.

उनके अनुसार एंटीनेटल केयर सेंटरों का प्रयोग करने वाली महिलाओं की संख्या, वर्ष १९९२ में ३.९%, १९९४ में १६.१%, १९९६ में २६%, १९९८ में ३१.६ फीसदी, २००० में ३४.२ तथा २००२ में ३८.६ प्रतिशत थी, जिसमें एक दशक में लगभग ९०० फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई थी. एचआईवी संक्रमित महिलाओं की औसत आयु में भी कमी हुई है. स्वाजीलैंड की महिलाओं में जहां यह ३७ वर्ष है वहीं दक्षिण अफ्रीका में ४९ वर्ष हो चुकी है. म्बांडल्वा की कहानी इससे कुछ अलग नहीं है. केपटाउन ग्रुप रेप क्राइसिस का अनुमान है कि बलात्कार का सरकारी आंकड़ा ५२००० था जबकि इसकी वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है. एक अनुमान के अनुसार यह लगभग २० गुना ज्यादा है. 

१७ अप्रैल २००२ को सरकार ने बलात्कार की शिकार महिलाओं को एचआईवी प्रतिरोधक पीईपी उपलब्ध कराने की घोषणा की थी. लगभग एक वर्ष बाद इसका कानून भी बन गया जिसमें कि बलात्कार की शिकार युवतियों को पीईपी अनिवार्य कर दिया गया. उनकी देखभाल के अलावा यौन संबंधों द्वारा फैलने वाली बिमारियों और गर्भधारण रोकने के लिए भी कहा गया. बलात्कारियों को मेडिकल ट्रीटमेंट देने का प्रावधान हुआ जिसमें केवल सरकारी ही नहीं बल्कि निजी चिकित्सालयों को भी चिकित्सा के लिए कहा गया.

दक्षिण अफ्रीका में बलात्कार ही नहीं है जिससे महिलाएं भयभीत हैं. दक्षिण अफ्रीका हृयूमन साइंस रिसर्च काउंसिलिंग संस्था ने २००४ में जो सांख्यिकीय आंकड़े प्रस्तुत किए उसके अनुसार यहां प्रत्येक ६ घंटे में एक महिला की हत्या उसके सहयोगी द्वारा कर दी जाती है. दक्षिण अफ्रीका की राजनीतिक अस्थिरता ने भी म्बांडल्वा जैसे बच्चों के लिए खतरा पैदा किया है. १९८० की लड़ाई के बाद अश्वेत लोगों के आपसी संघर्ष ने उस जैसे कई बच्चों को परिवार के साथ विस्थापित होना पड़ा तथा मां के अभाव में उन्हें खुद अपनी देखभाल करनी पड़ी. ऐसी परिस्थितियों में अन्य बच्चों की तरह वह भी लोगों की हवस का शिकार हुई.

इस विषय की गहराई में जाएं तो दक्षिण अफ्रीका में बलात्कार पर मतभेद भी हैं. रिसर्च ग्रुप कम्यूनिटी इंफारमेशन इंवायरमेंट ट्रांसपेरेंसी ने १४१८ स्कूलों के १० से १९ वर्ष के लगभग तीन लाख बच्चों पर सर्वेक्षण किया. इसके अनुसार वे बलात्कार या छेड़छाड़ को सेक्स हिंसा नहीं बल्कि आनंद का साधन मानते थे. इस रिपोर्ट में दक्षिण अफ्रीका के युवाओं का सेक्सुअल हिंसा और एचआईवी संक्रमण पर सर्वेक्षण था जो सेक्स की स्वीकार्यता और हिंसात्मक समाज में जीने की अनुकूलता दिखाता है.

सर्वेक्षण में ११ फीसदी लड़कों व ४ फीसदी लड़कियों ने दावा किया कि उन्हें सेक्स के लिए उकसाया गया. जबकि इनमें से ६६ फीसदी लड़कों व ७५ फीसदी लड़कियों को जबरन सेक्स का शिकार बनाया गया. शोधकर्ताओं के सामने यह काफी चौंकाने वाली आम धारणा आई कि यदि वे किसी वर्जिन के साथ सेक्स करेंगे तो उनका एचआईवी संक्रमण ठीक हो जाएगा. यह धारणा छोटे बच्चों व शिशुओं के साथ बलात्कार की ऊंची दर को साबित करता है.

वर्ष २००२ में केपटाउन स्थित रेडक्रास अस्पताल के ९ वर्षों तक शोध के बाद यह तथ्य सामने आया कि बलात्कार के शिकार बच्चों की सबसे कम उम्र ३ साल थी. यह वही उम्र थी जब म्बांडल्वा की मां बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती हुई और उसे बलात्कार का शिकार होना पड़ा. इस बात को कहने में कोई आश्चर्य नहीं कि दक्षिण अफ्रीका में सामूहिक बलात्कार आम है. केपटाउन की ग्रुट शूर रेप क्लिनिक व जोहांसबर्ग सनिंगहिल क्लिनिक के डा. एड्रिने वोल्फसन के अनुसार क्रमशः ७५ फीसदी व प्रति हजार मामलों में ६० फीसदी लोगों को चिकित्सा उपलब्ध करा दी जाती है.

शोधकर्ताओं ने पाया कि सामूहिक बलात्कार के दौरान बलात्कारी को सेक्स का आनंद नहीं मिल पाता है. वे एक दूसरे को बलात्कार करते हुए देखकर ज्यादा आनंदित होते हैं. ऐसी प्रवृत्ति अफ्रीका समेत उन सभी समाजों में देखा जा सकता है जो विघटन के दौर से गुजरे हैं. कंबोडिया के जेंडर एंड डेवलपमेंट संस्था के ल्यूक बेरूप डब्ल्यूएचओ द्वारा जुलाई २००४ में आयोजित सेक्सुअल हिंसा पर एक चर्चा के दौरान कहते हैं कि कंबोडिया में सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में शहरी और औसत मध्यम वर्ग के वे लोग शामिल होते हैं जो कभी स्कूलों या विश्वविद्यालयों के छात्र रहे हैं. ऐसे लोग इस तरह के घृणित कार्य करने में जरा भी संकोच नहीं करते और खुलकर अपनी भावनाएं जाहिर करते हैं. उनकी मानसिकता इसे पौरुष से जोड़कर देखने की होती है.

दक्षिण अफ्रीका में जैक रोलिंग का प्रचलन है. इसमें कोई औरत किसी पुरुष की इच्छा को नकारती है तो उसे सामूहिक बलात्कार का शिकार होना पड़ता है. दक्षिण अफ्रीका में बच्चों द्वारा ही बच्चों का बलात्कार करने की समस्या गंभीर रूप से पनप रही है. जोहांसबर्ग के टेड्डी बीयर क्लिनिक का कहना है कि उसके यहां बलात्कार के २५ फीसदी मामले ऐसे होते हैं जिसमें बलात्कारी की उम्र ७ से १४ वर्ष के बीच होती है. हांलाकि स्कूलों द्वारा इन बच्चों के लिए कुछ भी नहीं किया जाता. स्कूलों में काउंसिलिंग की सुविधा भी नहीं हैं.

सेक्स हिंसा विश्व का तेजी से बढ़ता अपराध है जिसमें दोषियों को मुश्किल से ही सजा मिल पाती है. सेक्स हिंसा ईकाई के अंतर्गत नेशनल प्रास्क्यूटिक अथारिटि के प्रमुख थोको माजोक्वेनी बताते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में कोर्ट के सामने बलात्कार के ५० फीसदी मामले लंबित पड़े हैं. जबकि डरबन व मडासाने में इसकी प्रतिशतता ६० है. दक्षिण अफ्रीकी सरकार का दावा है कि उसके यहां ७ फीसदी मामलों में बलात्कारियों को सजा मिल जाती है जबकि ब्रिटेन जैसे देश में यह केवल ५ फीसदी है.

विश्व बाजार में औरतों व बच्चों की तस्करी बढ़ रही है क्योंकि ये ड्रग्स से भी ज्यादा कमाई वाले धंधे हैं. द इंटरनेशनल आर्गनाईजेशन फार माइग्रेंसी का अनुमान है कि प्रतिवर्ष एक मिलियन से भी ज्यादा औरतों व बच्चों की तस्करी होती है. बेलारूस में अलेक्जेंडर लक्सेंकों के शासनकाल में हर साल दस हजार महिलाओं की तस्करी होती थी जबकि लोकतांत्रिक जर्मनी में यह आंकड़ा ५० हजार है.

अफ्रीका में पुरुष अपनी मानसिकता के कारण गंभीर समस्या बन चुका है. यहां बलात्कार जैसी घटनाओं में अपनी भागीदारी की चर्चा करना असामान्य घटना नहीं है. पौरुषता पर हुए एक सम्मेलन के समापन पर एक वक्ता ने यहां तक बताया कि जब वह युवा था तो शराब पीने और बलात्कार करने का आदी था. लेकिन जब वह शादीशुदा हुआ तो उसने वह व्यवहार अपनी पत्नी के साथ किया. लेकिन अब उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा है.

बेरूप लिखते हैं कि कंबोडिया में हिंसा दूसरी पीढ़ी के लोगों का अपने जीवन में खराब अनुभवों का नतीजा है. खमेर रुज के शासनकाल में गरीबी और कमजोर शासन की चुनौतियों के बीच लोगों ने इसका खट्टा अनुभव किया. इस पीढ़ी के अभिभावकों को खमेर रुज के शासनकाल में बर्बर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. जिसका नतीजा यह निकला कि लोग अपने बच्चों के साथ भी खराब व्यवहार करने लगे.

दक्षिण अफ्रीकी ग्रुप के समंवयक सिडनी सिबेको इस बारे में लोगों को विस्तार से बताते हैं. सिबेको अपने परिवार में एक ऐसे व्यक्ति के बारे में विचार करने का प्रयास कर रहे थे जो उनके लिए रोल माडल हो. लेकिन वे ऐसे किसी को भी ढूंढने में असफल रहे. उनके अनुसार मेरे परिवार में सकारात्मक दृष्टिकोण वाला कोई भी व्यक्ति नहीं था. वे अफसोस जताते हैं, "सचमुच मैं बुरी छवि वाले लोगों के बीच घिरा हूं".

दक्षिण अफ्रीका और कंबोडिया में सामाजिक विघटन व अपनी जनता के साथ बर्बर व्यवहार करने वाली सत्ता के कारण लोग अपना सम्मान भी भूल गए. देश की समस्याओं ने लोगों को इतना कमजोर कर दिया कि कई परिवार विघटन के कगार पर पहुंच गए. अभिभावक ऐय्याशी करने लगे जिससे आने वाली पीढ़ियां दिशाहीनता, बिना रोल माडल या आत्मसम्मान के अभाव में बड़ी हुईं. आत्मसम्मान का अभाव लोगों को खतरनाक जीवन जीने को मजबूर कर देता है. यही कारण है कि वहां पर एचआईवी/एड्स के सबसे अधिक रोगी हैं.

असफलताओं से उपजी छवि इस प्रकार की होती है कि वे काम के अभाव में एक दूसरे पर आक्रामक हो जाते हैं. वर्ष २००४ में प्रकाशित हयूमन साइंस रिसर्च काउंसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण अफ्रिका में ४० फीसदी लोग बेरोजगार हैं. इस बात में सच्चाई नहीं है कि निम्न वर्ग के लोग ही बलात्कार करते हैं, बल्कि यहां बलात्कार, सामाजिक व आर्थिक बंधनों से उपर उठ चुका है. हांलाकि सरकार ने बलात्कार के अलावा सभी प्रकार के अपराधों पर काबू पा लिया है.

सितंबर महीने का आंकड़ा देखें तो महिलाओं व बच्चों को छोड़कर सभी प्रकार के अपराधों में कमी आई है. वर्ष २००४ में ५५ हजार से भी ज्यादा बलात्कार की घटनाएं दर्ज हुईं. यह कहना गलत नहीं होगा कि जोहांसबर्ग के नवनिर्माण में एड्स सीमेंट का काम कर रहा है. जुलाई में सरकार ने रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसके अनुसार यहां ६.५९ मिलियन लोग एड्स के शिकार हो चुके हैं (जबकि यहां की जनसंख्या ४२ मिलियन है). करीब ६० हजार लोग इलाज के अभाव में मृत्यु के शिकार हो चुके हैं.

यहां के अधिकारियों की तरह ही राष्ट्रपति ने भी इस बात से इनकार किया कि यह महामारी का रूप ले चुका है. दक्षिण अफ्रीका के मेडिकल रिसर्च द्वारा जनवरी माह में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसके अनुसार यहां एचआईवी एड्स से मृत्यु के मामलों में ३०० फीसदी की कमी आई है. पांच साल से कम उम्र के ७४ फीसदी बच्चों की मृत्यु एड्स से हुई जबकि सरकारी आंकड़ो में इसे २५ प्रतिशत दिखाया गया.

यूएनएड्स की वर्ष २००३ की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की तरह पुरुषों में भी एड्स का आंकड़ा लगभग ढाई गुना बढ़ गया. वैश्विक स्तर पर यह बात स्वीकार की जाने लगी है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं व बच्चे एड्स की गिरफ्त में तेजी से आते जा रहे हैं. एड्स का संक्रमण ज्यादातर असुरक्षित यौन संबंधों या बलात्कार के कारण होते हैं. २६ वर्षीय एड्स काउंसलर नोजिफो म्तीम्कूलू कुछ इसी प्रकार के द्वंद्व से गुजरे हैं. वे दुख जताते हुए कहते हैं, "मैं लोगों को सुरक्षित सेक्स के बारे में कैसे समझाऊं".

एक दूसरे क्षेत्र में एमापोंडो की महारानी सिजकाउ रहती हैं और नेल्सन मंडेला भी उनकी इज्जत करते हैं. वे बताती हैं कि मेरे घर में एक महिला काम करती है जिसकी बेटी अपने शिक्षक से गर्भवती हो गई, जबकि हमारे समाज में शिक्षक का स्थान काफी ऊंचा है. जब इस शिक्षक एड्स से मृत्यु हुई तो हमें जानकारी हुई कि इसके कारण आठ महिलाएं एड्स की शिकार हो चुकी हैं. वह अपना सिर हिलाते हुए कहती हैं, यहां पर १६ लोग मरने की कगार पर हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि दूसरों से कैसे व्यवहार किया जाए.

यहां सेक्स की समस्याओं से लड़ना रोजमर्रा का काम हो चुका है, जो काफी कठिन तो है पर बेहद जरूरी भी. युद्ध के समय बलात्कार की घटनाओं को रेखांकित करना काफी आसान है लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि शांतिकाल में उससे अधिक बलात्कार होते हैं. बलात्कार के बड़े मामलों पर हमारा ध्यान काफी आसानी से जाता है लेकिन हम अक्सर अनदेखा करते हैं कि यहां बहुत से बच्चों की संख्या ऐसी है जिनका बलात्कार उनके अभिभावक करते हैं.

वर्ष २००३ में न्यूयार्क ने अपने यहां सभी प्रकार के अपराधों में १० फीसदी तक कमी लाने में सफलता प्राप्त की लेकिन बलात्कार के मामलों में ६ फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गई. सेक्स हिंसा से मुकाबला विदेशी सहायता से नहीं किया जा सकता बल्कि इससे लड़ने के लिए अपने समुदाय के लोगों का सहयोग प्राप्त करना होगा.

उपेक्षा के शासन में....

राष्ट्रपति थाबो म्बेकी दक्षिण अफ्रिका में शांति व्यवस्था बनाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन वर्णभेद व सेक्स उनके सामने समस्या बन कर उभरे हैं. वे उन लोगों के खिलाफ आक्रामक रवैया अपना लेते हैं जो अफ्रीका में बलात्कार व एड्स के बढ़ते मामलों पर चर्चा करते हैं. उनका रवैया एचआईवी के बढ़ते खतरों की ओर ईशारा करता है.

अक्टूबर २००४ में दक्षिण अफ्रीका में सेक्स हिंसा पर लिखने वाले लोगों की तरह ही यूएनएड्स के उपमुख्य निदेशक कैथलिन क्रावेरो को भी आलोचना का शिकार होना पड़ा. उन पर वर्णभेद का आरोप लगाया गया. उन्होंने लिखा कि "जितनी महिलाएं पूरे एशिया में एड्स से ग्रसित हैं उतनी संख्या केवल अफ्रीका मे है, क्योंकि विकल्प के अभाव में महिलाएं इस स्थिति में नहीं होतीं कि वे सावधानी बरतें, न तो वे कंडोम और न ही उनको विश्वास में लेने की स्थिति मे होती हैं". म्बेकी इस बारे में कहते हैं, "स्पष्टतः एशियाई व अफ्रीकी लोग सेक्स आक्रामक होते हैं".

इस बयान पर संसद में काफी हंगामा मचा और गरमागरम बहसें हुईं". एएनसी वेबसाइट पर उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद में जो कुछ भी कहा गया वह उनका नहीं बल्कि मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के एक अफ्रीकन, अमेरिकन प्रोफेसर. डा. एडवर्ड राइम्स द्वारा लिखा गया था. एक अश्वेत महिला पर्यवेक्षक रोडा कैडेली क्रोधित होकर कहती हैं "इसका मतलब यह है कि हमें राष्ट्रपति से कहना चाहिए कि वे अश्वेत पुरुषों को महिलाओं से दुर्व्यवहार करने के लिए कहें". यह भी हो सकता है कि हमें महिलाओं के लिए सेक्स स्वायत्तता की मांग करनी चाहिए जो एक मिथक है. पुरुष ना सुनने का आदी नहीं है और पत्नी को वह निजी संपत्ती समझता है.

एक महीने बाद राष्ट्रपति म्बेकी ने नोबेल पुरस्कार विजेता आर्चविशप डेशमंड तूतू पर अपने साप्ताहिक पत्र एएनसी में आलोचना किया. उस माह के अंत तक इस मामले पर ढेरों मेल लिखे गए और गार्जियन समाचार पत्र ने एएनसी के इस लेख को गैरजिम्मेदाराना, महत्वहीन व तूतू पर आक्रमण करने वाला बताया. सत्ताधारी दल के दस साल के शासनकाल में बहुमत में रहने के बावजूद एएनसी लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी. सत्ता में आने के बाद पार्टी का विश्वास लगातार डगमगाता रहा है.

(सौजन्य सेः ली मोंड डिप्लोमेटिक)