सीमाएं तोड़ता सेंसेक्स

इन दिनों शेयर बाजार में उछाल सरकारी निष्क्रियता व संगठित लूट का पर्याय बन गया है

संजय कपूर

जब जब शेयर बाजार में तेजी नजर आती है तब तब मुझे इसमें किसी घोटाले की बू आती है. मै हाल ही में मुंबई गया था, लेकिन इस यात्रा से मेरी यह ग्रंथि दूर नहीं हुई. वहां शेयर बाजार का एक महत्वपूर्ण स्रोत मेरे पास आया और उसने बताया कि "बाजार में राजनेताओं का बहुत सारा पैसा लगा है, इसी वजह से मुंबई शेयर बाजार के सूचकांक उछल रहे हैं.

उसने बताया कि एक राजनेता ने तो विदेशी संस्थागत निवेशक के जरिए ३०० करोड़ रुपए के शेयर खरीदे हैं. वह हर तरह के शेयर में निवेश कर रहा है. इस समय सत्ता पक्ष और विपक्ष दल के नेताओं का बहुत सारा पैसा बाजार में लग रहा है. उसने बताया कि बहुत से राजनेता, नौकरशाह मंझोली कंपनियों में निवेश कर रहे हैं. यदि तेजी जारी रहती है तो इन मंझोली कंपनियों को जिन्होंने बाजार से बहुत अधिक कमाई की है उनको सरकारी ठेके मिल सकते हैं.

अगर बाजार धराशायी होता है तब छोटे निवेशकों और इन राजनेताओं को सबसे ज्यादा घाटा होगा. इसके अलावा हरसंभव विदेशी निवेश हासिल करने की इच्छुक सरकार को भी भारी घाटा होगा. इसलिए लोग यह सुनिश्चित करने में जुटे हुए हैं कि कहीं बाजार धराशायी न हो". सरकार ऐसे किसी व्यक्ति की भांति काम कर रही है जिसके घर ताश के पत्ते के समान हैं और उसे किसी भी प्रकार की आजादी नहीं है.

समाचार माध्यमों द्वारा शेयर बाजार में दिन दूनी रात चौगुनी उछाल की खबरें जोर शोर से उठाए जाने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बड़ी ही दुविधा में यह बयान दिया कि शेयर बाजार में जोरदार उछाल की कोई जांच नहीं होगी. उल्टा उन्होंने पत्रकारों पर ही निशाना साधा और इसे "हिट एंड रन" पत्रकारिता करार दिया.

शेयर बाजार पर निगरानी रखने वाली संस्थाएं भारतीय रिजर्व बैंक व भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि बाजार में मौजूदा उछाल की कोई जांच नहीं हो रही है. इससे पेनी स्टाक और शेयर बाजार पर निगरानी रखने वाली कंपनियां चिंतामुक्त हो गई हैं. मुंबई शेयर बाजार में २६०० शेयरों में से ६०० पेनी स्टाक के रूप में कार्य कर रही हैं लेकिन निगरानी रखने वाली संस्थाओं ने कुछ के ही खिलाफ कार्रवाई की है. लेकिन यदि नियंत्रक व जांच एजेंसियां इस बारे में जांच नहीं करती हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि यहां कुछ भी गड़बड़ नहीं है.

दरअसल यह बहुत ही उलझा हुआ सवाल है और जब तक हमारे पास स्वतंत्र, पारदर्शी व कड़ाई के साथ निगरानी रखने वाली संस्थाएं नहीं होंगी इसका जवाब नहीं मिल सकता है. नियंत्रकों द्वारा इतने विशाल वित्तीय बाजार पर बिना संसाधनों के नियंत्रण रख पाना कठिन साबित हो रहा है. इसके अतिरिक्त शेयर बाजार में कुछ वैश्विक व घरेलू खिलाड़ी हैं जो आर्थिक संसाधनों के बल पर नियंत्रक संस्थाओं पर शिकंजा कसे रहते हैं. ये लोग अच्छी तरह जानते हैं कि काले धन को कैसे और किस प्रकार के शेयरों में खपाना है और वे जब चाहते हैं बाजार से अपना हाथ खींच लेते हैं.

वे हमेशा अच्छे मौके की तलाश में रहते हैं. शेयर बाजार में कुछ बड़ी भारतीय कंपनियां हैं जो इन मंझोली कंपनियों पर अपना नियंत्रण रखती हैं और तेजी के दौरान इनसे लाभ कमाती हैं. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो शेयर बाजार पर नियंत्रकों द्वारा कड़ी निगरानी की आवश्यकता है ताकि बाजार को ध्वस्त करने वाले संगठित अपराधीकरण से मुक्त रखा जा सके. इन सबके बावजूद सरकार का रवैया ऐसा नहीं है जिसे विश्वसनीय कहा जा सके.

इन दिनों शेयर बाजार में तेजी सरकार की निष्क्रियता व संगठित लूट का पर्याय बन गया है. इस बात को इसी से समझा जा सकता है कि १९९२ में पहली बार अनियंत्रित उछाल आया तो वह किसी प्रकार की निगरानी रखने में असमर्थ रही और खुला खेल देखती रही. बाद में वह ३२०० करोड़ रुपए के इस घोटाले में दोषियों का पता लगाने में नाकाम रही और यह भी नहीं जान पाई कि यह पैसा कहां गया. यह मीडिया ही था जिसका हर स्तर पर नेताओं द्वारा माखौल उड़ाए जाने के बाद भी इस घोटाले का पर्दाफाश किया.

इसने दिखाया कि कैसे राजनेताओं से प्रभावित सार्वजनिक कंपनियों के कर्ताधर्ताओं ने उठते गिरते संवेदनशील शेयर बाजार में पब्लिक फंड को निवेश करने के लिए शेयर बाजार के बेताज बादशाह हर्षद मेहता को खुली छूट दी. १९९२ व २००१ में हुए शेयर घोटाले की जांच ने उन सभी को खासा निराश किया जो इस घोटाले की संरचनात्मक ढ़ांचे के बारे में जानना चाहते थे. जांच में अंत तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कैसे सरकारी विभाग, सार्वजनिक कंपनियों व बैंको ने बाजार को नुकसान पहुंचाया. यह भी अंधेरे में रहा कि इन निवेशों के बारे में निर्णय लेने के पीछे पेशेवरों द्वारा बाजार से निकली जानकारियां थीं या कुछ बाहरी शक्तियां.

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