दुबईः विवादों का वरदान

यह शायद हमारे लिए अविश्वसनीय हो लेकिन, दुबई के धन का भारत-पाक संबंधों से गहरा रिश्ता है,

संजय कपूर
भारतीय समयानुसार आधी रात का समय है. इंडियन एयरलाइंस की ए ३२० फ्लाइट, धीरे-धीरे दाहिने किनारों की तरफ करवट लेती है और लंबी, स्वर्णिम व सर्पिल आकार का विस्मयकारी दृश्य अंधेरे में चमकता हुआ दिखाई देता है.

आश्चर्य की बात थी कि यह या तो रेगिस्तानी सड़क या फिर समुद्री तट का किनारा लगा. थोड़ी देर बाद यह चमकदार लंबे सर्पिल धागे के आकार का दृश्य, पूरी तरह फैल गया. यह दुबई है-एयरहोस्टेस ने बताया. यह मनोहारी दृश्य उन लोगों ने देखा जिन्होंने खिड़की के पास की सीट बैठना पसंद किया था. जादुई आभा समेटे यह दृश्य सीसे और कंक्रीट की रचनाओं में तब्दील हो गया.

दुबई का एयरपोर्ट काफी व्यस्त और विशाल है. भारत से केवल चार घंटे की दूरी और ऐसा लगा जैसे हम पहली दुनिया के किसी देश मे हैं. यहां चारो तरफ नजर दौड़ायें तो ढ़ेरों की संख्या में भारतीय व पाकिस्तानी नागरिक दिखाई देते हैं. पश्चिम या सुदूर पूर्व की ओर जाने की बजाय यहां केवल स्रमिक वर्ग के लोग हैं. संभव है कि वहां जाने के लिए बहुत से मजदूर, बढ़ई, ड्राईबर इत्यादि की लंबी कतार लगी हो.

एयरपोर्ट से बाहर आने पर लगा जैसे भारत को किसी साफ सुथरे व विश्वस्तर के वातावरण वाले शहर में बसा दिया गया हो. शहर की साफ सुथरी, चौड़ी सड़कें, गगनचुंबी इमारतें तथा पश्चिम के माल भारतीयों से भरे पड़े हैं. दुबई काफी पैसों वाला शहर है और ऐसा दिखता भी है.

तीस साल पहले, वास्तव में दुबई इस स्तर का शहर नहीं था. यह छोटा सा शहर था जो मुद्रा से लेकर प्रत्येक चीज पर भारत पर निर्भर था. यह देश खाड़ी के चारो तरफ बसा है, जहां भारतीय व्यापारी मुंबई व मालाबार के तटीय शहरों से यहां आए.

अपनी अधिकतर आवश्यकताओं के लिए, दुबई ब्रिटिश भारत पर निर्भर था और १९९६ तक इसकी मुद्रा भी रुपया थी. भारत के टाटा जैसे बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान अफ्रीका से व्यापार करने के लिए खाड़ी देशों का प्रयोग करते थे.

लेकिन इसके भाग्य में बड़ा उछाल तब आया जब भारत सरकार में उस समय के वित्तमंत्री मोरारजी देसाई ने गोल्ड कंट्रोल एक्ट के तहत सोने के आयात पर रोक लगा दी. देसाई के निर्णय ने सोने की स्मगलिंग में भारी योगदान किया और हवाला का व्यापार अपने उफान पर आ गया जिसमें कि गैर-बैंकिंग क्षेत्र से पैसों का लेन देन होता है.

सोने की स्मगलिंग बहुत बड़ा व्यापार था जिसमें दुबई के बड़े व्यापारी कूद गए. सोने के कुछ प्रतिष्ठित व्यापारियों के उपर मुंबई थाने में पुराने मामले अभी भी दर्ज हैं. १९७० के प्रारंभिक वर्षों में सोने के अवैध व्यापार ने हाजी मस्तान, यूसुफ पटेल और सुकूर नरायण बखिया जैसे स्मगलिंग लीजेंड पैदा किया.

दुबई की अपनी न्याय व्यवस्था और मूल्य हैं जो हमसे मेल नहीं खाते. इसने बहुत से अपराधी उद्यमियों और फिल्म लेखकों को आकर्षित किया. भारत और खाड़ी को विभाजित करने वाले जल पर स्मगलर मौज मस्ती करते रहे.

इसमें अंतिम सबसे बड़ा स्मगलर दाऊद इब्राहिम था जो आतंकवादी गतिविधियों में बड़े पैमाने पर लिप्त रहा. सोने की स्मगलिंग सन् १९९१ में उस समय के वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के समय तक चलती रही जिन्होंने इसके आयात से प्रतिबंध हटाकर इससे पैदा हो रही अपराधिक गतिविधियों का खात्मा किया.

शुरुआती समय में दुबई भारत के सोना प्रेम से काफी लाभांवित होता रहा लेकिन धीरे धीरे यह व्यापारिक हब बन गया. इसके भाग्य में सबसे बड़ा उछाल पड़ोसी देशों के युद्ध और बिखराव के बाद आया. संयोगवश, दुबई का उदय १९६६ में अपनी मुद्रा रुपया के अवमूल्यन के बाद हुआ और दक्षिण एशियाई देशों के बीच युद्ध में एक कड़ी के रूप में प्रयोग होने के कारण अन्य देशों के लिए एक आकर्षक स्थान बन गया.

उसी समय से यह विवादित देशों के बीच यह एक व्यापारिक प्रतिष्ठान के रूप में विकसित हुआ. भारतीय और पाकिस्तानी उपभोक्ता इससे घाटे में रहते हैं क्योंकि उन्हें वस्तुओं के अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है. यह दुबई है जो एक अमीर देश के रूप में उभर चुका है.

एक मोटे अनुमान के अनुसार वर्ष २००४ में तीसरी दुनिया के देशों से वहां का व्यापार ३.५ बिलियन डालर के आसपास था. जबकि उस समय यहां का वैद्य व्यापार ४०० मिलियन डालर के करीब था. अधिकतर सामान तीसरी दुनिया के उन देशों द्वारा आयात किया गया जिन्हें पाकिस्तान के घरेलू उद्योगों द्वारा रोक लगा दी गई.