सवालों का सौदा
लंबे समय से निचले व उपरी सदन में कुछ लोगों द्वारा प्रश्न काल का उपयोग अपना व्यवसाय स्थापित करने और अन्य लाभ के लिए होता रहा है
विजय सांघवी
दशकों से संसद के दोनों सदनों में सदस्यों द्वारा प्रश्न काल का उत्साहपूर्वक सामना किया जाता था क्योंकि समझा जाता है कि सरकार से सूचनाओं की सही जानकारी प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है दशकों से संसद के दोनों सदनों में सदस्यों द्वारा प्रश्न काल का उत्साहपूर्वक सामना किया जाता था क्योंकि समझा जाता है कि सरकार से सूचनाओं की सही जानकारी प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है. पहले भी संसद सदस्य प्रश्नकाल के दौरान मंत्रियों को अक्सर उलझन की स्थिति में रखते थे.
संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही को उत्तरदायी बनाने वाले संविधान निर्माताओं ने भी यह उम्मीद नहीं की थी कि एक दिन सदन का सवाल जवाब नैतिकता से विचलित होकर धन पर आधारित हो जाएगा. एक वेबसाइट के स्टिंग आपरेशन में ११ संसद सदस्य पैसे लेते हुए कैमरे में कैद हुए, जिसमें दस लोक सभा तथा एक राज्य सभा के थे. इस आपरेशन ने दिखाया कि कितनी आसानी से ये सदस्य थोड़े पैसों के लिए अपना सौदा कर रहे हैं वो भी उन लोगों के लिए जो उनसे बिल्कुल अपरिचित थे.
मीडिया के लोग दशकों से इस हकीकत से परिचित थे कि सदन के प्रश्न काल का दुरुपयोग किया जाता है. संसद सदस्य अपने लिए नहीं तो अपनी पार्टी के लिए इसके जरिए धन जुटाते हैं. प्रश्नकाल जैसे महत्वपूर्ण विषय का उपयोग व्यवसायी अपना व्यवसाय स्थापित करने के लिए करने लगे हैं. स्टिंग आपरेशन में उजागर हुआ सत्य कोई नई घटना नहीं है बल्कि सातवीं लोक सभा के समय से ही फार्माक्यूटिकल कंपनियां राज्य सभा के माध्यम से अपनी लड़ाई लड़ती रही हैं.
आमतौर पर प्रत्येक सप्ताह ही सदन की कार्यवाही के दौरान विरोधियों द्वारा ड्रग्स की वैधानिकता पर सवाल पूछे जाते हैं. इसका संकेत इसी से मिलता है कि कुछ ड्रग्स के नाम इतने कठिन होते हैं कि सदस्य प्रश्न के दौरान उसका ठीक से उच्चारण भी नहीं कर पाते. राज्य सभा सदस्य डा. लियोन डी सूजा कई बार इस मसले को उठा चुके हैं कि ड्रग्स कंपनियां अपनी लड़ाई उपरी सदन के जरिए लड़ रही हैं.
ऐसा ही एक मामला पांचवी लोक सभा में देखने को मिला जब विपक्ष के एक सदस्य ने एक कपड़ा व्यवसायी को सबक सिखाने के लिए प्रश्न पूछने के अधिकार का दुरूपयोग किया. मध्य प्रदेश से संसद में आया यह सदस्य एक दुकान से साड़ियां पसंद किया और उन्हें बिना पेमेंट के ही अपने घर पहुंचाने को कहा. दुकानदार ने बिना पेमेंट दिए ऐसा करने से इनकार कर दिया. इससे नाराज सदस्य ने सदन में इस फर्म की टेक्स संबंधी जानकारियां मांगी. आयकर विभाग ने इस फर्म पर छापा मारा जिससे तीन दिनों तक इसका कार्य बाधित रहा.
१९७८ में जब पश्चिम बंगाल से कांग्रेस सदस्य सौगत राय को पूरी घटना की जानकारी हुई तो वह बहुत नाराज हुए और उस सदस्य के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने का विचार किया. लेकिन वे सदन की गरिमा का ख्याल रखते हुए इस विचार को त्याग दिया. स्पीकर ने भी इस सदस्य के सभी प्रश्नों को भविष्य में प्रतिबंधित कर दिया. पार्टी ने इस पर कार्रवाई करते हुए सदस्य की उम्मीदवारी को खारिज कर दिया.
ऐसा ही एक मामला वर्ष १९८२ में आया जब अरुण नेहरू ने इसी प्रकार के एक सवाल पर हस्ताक्षर किया था. यह प्रश्न एक संदेशवाहक द्वारा उनके चेंबर में लाया गया. उन्होंने बिना जांच पड़ताल किए ही इसे अपनी स्वीकृति दे दी. लेकिन यह प्रश्न जब कृषि मंत्रालय द्वारा दिल्ली म्यूनिसिपल कारपोरेशन को जांच के लिए भेजा गया तो उसने इसके आधार पर चांदनी चौक में एक बेकरी को सील कर दिया. कुछ सप्ताह बाद जब उनकी ही पार्टी के सदस्यों द्वारा इस मसले को उनसे अवगत कराया गया तो अरूण नेहरू काफी आश्चर्यचकित हुए. यह पूरा मामला दो भाईयों के बीच व्यापारिक दुश्मनी के कारण था जिसमें एक गुट इसमें सफल रहा.
संसद सदस्य सांसद निधि को संसदीय क्षेत्र के विकास कार्यों में खर्च करने की बजाय उसका दुरूपयोग व कमिशनखोरी करते हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर अपने पार्टी के सदस्यों से कमीशन से मिले धन को पार्टी फंड में जमा करने को कहा था. इन सारे मामलों में जो कुछ भी हो रहा था उससे अधिकतर लोग अवगत थे.
स्टिंग आपरेशन में दोषी पाए गए सदस्यों के प्रति उनका रोष इस बात का था कि वे थोड़े पैसों के लिए कितनी आसानी से अपनी सेवाएं देते हुए पकड़े गए. सवालों का सौदा कर रहे सदस्यों के निष्कासन से जो भी संदेश गया हो लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका निष्कासन इसको जड़ से समाप्त कर पाएगा?

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