हांग कांग में जमीन बचाने की कवायद

विश्व व्यापार संगठन में कुछ देशों के प्रभावशाली रवैये के कारण सरकार पर रक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए भारी दबाव हैं जहां यह अधिक आक्रामक होकर ही अपना बचाव कर सकती है एन चंद्र मोहन, दिल्ली दिसंबर २००५ में हांग कांग में संपन्न हुई विश्व व्यापार संगठन की मंत्रीस्तरीय सम्मेलन के बाद यह तय नहीं हो पाया कि इस दौर की वार्ता के बाद भारत लाभ या हानि, किस स्थिति में है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री कमल नाथ ने दावा किया कि विश्व व्यापार संगठन के वर्तमान सम्मेलन में विश्व को भारत की चिंता से पूरी तरह अवगत करा दिया गया है. वाम दल और भारतीय जनता पार्टी इससे पूरी तरह सहमत नहीं है और उनका कहना है कि वे भारतीय हितों की रक्षा करने में पूरी तरह असफल रहे हैं. हांग कांग दौर के बाद सवाल यह उठ रहा है कि भारत की वास्तविक स्थिति क्या है? इस मुद्दे का विश्लेषण करने में कठिनाई यह है कि अमीर देशों के समूह का इस पर आधिपत्य के कारण भारत जैसे देशों से भेदभावपूर्ण रवैया अपनाते हैं. इस पर बहस करने की बजाय कि विश्व व्यापार संगठन में भारत आक्रामक रूप से किस प्रकार अपने हित सुरक्षित रख सकता है. यह दृष्टिकोण अत्यधिक निराशाजनक, सुरक्षात्मक व समझौतावादी दृष्टिकोण की वकालत करता है. सत्यता यह है कि ऐसी वार्ताओं में सरकार जो कुछ भी करती है उसे निश्चित रूप से भारत के राष्ट्रीय हितों के सौदों के तौर पर लिया जाता है. लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत के राष्ट्रीय हित क्या हैं? भारतीय जनता पार्टी और वाम दल इस विषय पर अधिक खुलासा नहीं करते लेकिन उनके अनुसार भारत को डब्ल्यूटीओ बैठक से कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ और इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.स्वभावतः जो भी सत्ता में होता है विपक्ष का रवैया आक्रामक और सरकार का रक्षात्मक होता है इसलिए राष्ट्रीय हितों के सौदे की बात उतनी गंभीर नहीं मानी जा सकती. फिलहाल वाम दलों को विश्वास में लेना कमलनाथ के सामने चुनौती है जिसके सहयोग पर वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का अस्तित्व टिका है और बीजेपी ने इस मसले पर ज्यादा कुछ नहीं किया है. उनकी असहमति मुख्य रूप से यह थी कि मंत्री ने भारत के लाखों छोटे भारतीय किसानों के हितों का ख्याल नहीं रखा और उन्हें विकसित देशों के बड़े छद्म किसानों के सामने कोई सुरक्षा नहीं दी और लूटने के लिए खुला छोड़ दिया. विश्व व्यापार संगठन में कृषि क्षेत्र काफी विवादित मुद्दा माना जा रहा है और इस पर यूरोपीय यूनियन देशों के सब्सिडि में कमी और शुल्क कटौती पर दृढ़ रहने की प्रशंसा करनी होगी. हांग कांग मंत्रीस्तरीय बैठक के अंत में जो मसौदा तैयार हुआ उसके अनुसार सभी आयात सब्सिडि को समाप्त करने में तीन साल का समय लगेगा जबकि इसके पहले ही पूरा हो जाने की संभावना थी. मसौदे के अनुसार २०१३ तक कटौती का कुछ महत्वपूर्ण भाग आवश्यक रुप से लागू हो जाना चाहिए था. इसमें स्पष्ट है कि कटौती अप्रतक्ष्य सब्सिडि के रूप में भी फार्म उत्पादों, एक्सपोर्ट क्रेडिट, स्टेट ट्रेडिंग इंटरप्राइजेज और खाद्य उत्पादों पर आना चाहिए.कमलनाथ के खिलाफ वाम मोर्चा व बी‌जेपी की आलोचना को गंभीर नहीं माना जा सकता कि भारत के लिए इसमें कुछ भी नहीं है. भारत, ब्राजील और आस्ट्रेलिया के किसानो के विपरीत जो कि अधिक मात्रा में कृषि उत्पादों का निर्यात करते हैं, हमेशा से ही यहां के अधिकतर कृषि भाग पर काबिज लाखों छोटे किसानों को सुरक्षित करने की आवश्यकता रही है. भारत सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकता है. फिर भी, यह विश्व में सबसे ज्यादा कृषि शुल्क के साथ बंद अर्थव्यवस्था रहेगा. इसे कोई नहीं बदल सकता है चाहे हांग कांग हो या न हो. खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए घरेलू सहयोग और कृषि उत्पादों को बाजारों तक पहुंचाने के बारे में भारत किसी भी कटौती में छूट दे सकता है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री ने जो सुरक्षा का दावा किया है उसके अनुसार किसानों को घरेलू सहयोग प्रदान करने के लिए सरकार पर कोई नियंत्रण नहीं है. इस समझौते से भारत जैसे देशों को आयात के असंतुलित प्रतिस्पर्धा से छुटकारा मिल जाएगा. आयात में उफान या आयात शुल्क बहुत कम होने के कारण भारत कृषि उत्पादों के शुल्क में वृद्धि कर सकता है.यद्यपि कुछ देशों के प्रभावशाली दृष्टिकोण के कारण कोई भी इसे सौदा के अलावा कुछ भी नहीं सोच सकता है. यहां लोग यह भूल गए हैं कि किसी समझौते में आदान प्रदान होता है इसलिए यह कैसे संभव है कि भारत एक इंच भी पीछे हटे अमेरिका और यूरोपीय संघ कृषि सब्सिडि और मूल्य में कटौती के लिए कहते. भारत के विपरीत ब्राजील जो कि बड़ा कृषि उत्पाद निर्यातक देश है, वह अमेरिका और यूरोपियन संघ के बाजारों से बहुत लाभांवित होगा. कृषि पर भारत का रवैया काफी सुरक्षात्मक है और केवल सेवा क्षेत्र में इसकी प्रतिस्पर्धा है. बहुत से विकासशील देशों के विपरीत भारत इस क्षेत्र में काफी आक्रामक है जैसा कि इसने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में आयात में रुचि दिखाई है. व्यक्तिगत या सीमापार सेवाएं देने में भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों में पहुंच बढ़ा रहा है. हांग कांग की मंत्रीस्तरीय सम्मेलन से संकेत मिलता है कि इस विषय पर सीमित प्रगति हुई है. यदि विपक्ष के कारण अमेरिका और यूरोपीय संघ इस मार्ग को बंद करते हैं तो भारत की कृषि और औद्योगिक शुल्क पर असर पड़ेगा. भारत के नजरिए के अनुसार सेवा क्षेत्र, कृषि और औद्योगिक शुल्क से हटकर एक अलग छवि प्रस्तुत करते हैं. जैसा कि यह सूचना प्रौद्योगिकी और व्यापार सेवा के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है, वास्तव में यह देश डब्ल्यूटीओ की वार्ता में याचक था. यह सीमापार सेवा प्रदान करने सहित विकसित देशों को सेवा देने में अपने व्यापारिक सहयोगियों से अधिक उदार नीति की अपेक्षा कर रहा था. अंतिम चीज इस पर भारी दबाव है जहां कि इसे आक्रामक होना चाहिए वहां सुरक्षात्मक रवैया अपनाना पड़ा है.दुर्भाग्यवश यह ताकतवर देशों के नजरिए के कारण ही है. वाम दलों ने यूपीए सरकार से कहा कि वे विदेशी शिक्षण संस्थानों को भारत में अपनी शाखाएं खोलने की अनुमति न दें जैसा कि विश्व व्यापार संगठन समझौते में अगस्त २००५ में किया गया है, क्योंकि इससे "सांस्कृतिक संवेदनहीनता" फैलेगी. भारत ने उसके बाद व्यापक रुप से आर्किटेक्चर, टूरिज्म, जीवन बीमा, नवनिर्माण, संस्कृति, और खेल के क्षेत्र में नई सेवाओं का प्रस्ताव रखा. हांग कांग के बाद दबावों के आगे बार बार झुकने से बहुत से वार्ताओं में भारत का हाथ कमजोर हुआ है. सवाल यह है कि शैक्षणिक संस्थान क्यों नहीं खोले जा सकते? वाम दलों की यह दलील कि इससे सांस्कृतिक संवेदनहीनता आएगी, उन्होंने इस परिवेश को रेखांकित किया है कि विदेशी विश्वविद्यालयों का परिवेश भारत के स्वतंत्रता संग्राम और कश्मीर जैसे संवेदनशील मामलों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से अलग हटकर कुछ और ही होता है. कैबिनेट के अनुमोदन के बाद जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इसे अगस्त महीने तक टाल दिया तो यह स्पष्ट रुप से सामने आ गया. सूक्ष्मता से निरीक्षण करें तो यह स्पष्ट है कि यूरोपीय यूनियन और अमेरिका विकासशील देशों में व्यापारिक उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं. इसलिए अमेरिका या यूरोपीय देशों का कोई वकील या बीमा कंपनी भारत में अपना कार्यालय स्थापित करने की ज्यादा इच्छा है जिससे कि वे यह सेवा वाणिज्यिक उपस्थिति के जरिए प्रदान कर सकेंगे. इसके अनुसार मोड३ के अंतर्गत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में अत्यधिक उदार नीतियों की अपेक्षा कर रहे हैं. अधिक बेरोजगारी के कारण विकासशील देश अपने यहां लोगों के संचलन में उदार शासन के कारण ज्यादा उत्साह नहीं दिखाते. स्वभावतः ऐसे समझौतों में दबाव बनाकर सौदेबाजी की गुंजाइश होती है खासकर कृषि के क्रास सेक्टोरल छूट व औद्योगिक शुल्क में. अब तक हमारा उद्देश्य कृषि पर ध्यान केंद्रित करना रहा है और दोहा राउंड की बैठक में सेवाओं पर सफलतापूर्वक बातचीत समाप्त हुई थी. यदि यूरोपीय देशों को एक देश मान लिया जाए तो प्राथमिक तौर पर सेवाएं प्रदान करने के मामले में केवल ६४ सदस्य देशों ने ही अपनी स्वीकृति दी थी. जबकि १५ देशों ने ही संशोधित प्रस्ताव पेश किया. समय की ज्यादा खपत और पुनः पुनरावृत्ति के कारण सेवा व्यापार समझौता को देखते हुए इस बात का डर है कि वर्ष २००६, इस समझौते को लागू करने के लिए पर्याप्त होगा. यद्यपि दबाव बनाने की मानसिकता के कारण विश्व व्यापार संगठन में भारत का दृष्टिकोण काफी सुरक्षात्मक था जबकि सेवाओं के मामले में जहां कि देश तुलनात्मक रूप से लाभदायक स्थिति में है और अपनी ऊंची आकांक्षाओं को पूरा कर सकता है. हांग कांग का नतीजा यह रहा कि भारत कृषि मुद्दे पर एक इंच भी पीछे नहीं हटा है जबकि सेवाओं के मामले में वह लाभप्रद स्थिति में है. यह तो भविष्य ही तय करेगा कि भारत विश्व व्यापार संगठन में लाभ की स्थिति में रहा या हानि.

Topic: