फ्रांसः रंगभेद के खिलाफ जंग
फ्रांस की सरकार ने उपद्रव के माहौल का उपयोग कानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए किया है
डामिनिक विडाल
विस्फोटक पाउडर में विस्फोट के लिए फ्यूज की जरूरत होती है. फ्यूज के अभाव में पाउडर ज्वलनशील नहीं हो सकता. बिना पाउडर के फ्यूज का भी कुछ अस्तित्व नहीं है. फ्रांस का सबसे पिछड़ा जिला बेनाल्यूस की हाल की घटनाएं इसका उदाहरण हैं.
यदि आंतरिक सुरक्षा मंत्री निकोलस सर्कोजी फ्रांस के अगले राष्ट्रपति होते हैं तो वे वर्तमान प्रधानमंत्री डामनिक दी विलेपिन और विरोधी नेता जीन मैरी ली पेन व फिलिप डी विलेयर्स पर वरीयता को अवश्य बनाए रखना चाहेंगे. इसलिए अपनी कड़ी रणनीति का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने फ्रांस में व्यापक स्तर पर भड़के दंगे और आगजनी पर काबू पा लिया. उनके उत्तेजक बयानों के बाद पुलिस ने आगजनी वाले शहरों में औपनिवेशिक काल के सैनिकों की याद ताजा कर दी और अरब व अफ्रीकी मूल के लोगों के साथ बर्बर आचरण किया.
इस विषय पर वोल्टेयर का विचार है कि "कुछ समय के लिए आप अपना स्वभाव बदल सकते हैं" लेकिन अतीत आपका पीछा नहीं छोड़ता. यहां भी इतिहास ने अपने को दोहराया है. पहली बार इसका प्रदर्शन उस समय हुआ जब इमरजेंसी लेजिसलेशन १९५५ को लागू करने के लिए कर्फ्यू लगाने का निर्णय किया गया जिससे अक्टूबर १९६१ में पेरिस में कई दर्जन अल्जेरियन मूल के लोगों की हत्याएं हुईं और न्यू कैलेंडोनिया के ओविया में १९ पर्यवेक्षकों को मई १९८८ में जान से हाथ धोना पड़ा.
सर्कोजी का भूसंपत्ति कब्जे में लेने और भीड़ को ताकत से नियंत्रित करने के कारण पेरिस के उपनगर में दो घटनाएं हुईं, जिसमें एक विद्युत उपकेंद्र में दो बच्चों की मौत हो गई और एक मस्जिद के सामने आंसूगैस का गोला फटा.
निश्चित तौर पर यदि सर्कोजी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए प्रभावित इलाकों में जाकर दुःख जताते तो इस उपद्रव को रोका जा सकता था. लेकिन इस समाजवादी नेता द्वारा उठाए गए कदम से उन पर षड़यंत्र रचने का आरोप लगा. जबकि एक साल पहले ही स्टेट आडिटिंग बाडी के कौर डीस काम्पटीस ने इस मुद्दे को उठाया था कि यह समस्या आप्रवास के कारण नहीं बल्कि इसे सही तरीके से ग्रहण न कर पाने के कारण हुई. वर्तमान परिस्थितियों में जो समस्या सामने है वह अचानक नहीं बल्कि इसकी आग दशकों से सुलग रही थी.
यद्यपि विचारधारा से जुड़े लोगों के अनुसार इसमें संगठित अपराधियों और इस्लामिक लोगों का हाथ है जबकि अधिकतर पर्यवेक्षकों के अनुसार यह विस्फोटक स्थिति तात्कालिक परिस्थितियों के कारण उपजी थी. गंभीर अपराध भी विश्व शांति का हिमायती होता है. इसमें धार्मिक नेताओं ने मध्यस्थता का प्रयास किया जैसे कि फ्रांस के मुस्लिम धार्मिक संगठन यूनियन डेस आर्गनाइजेशन्स इस्लामिक्स डी फ्रांस ने हिंसा के खिलाफ अनोखा फतवा जारी किया.
ये सारी परिस्थितियां कुछ भी रही हों लेकिन लगभग ७०० समस्याग्रस्त संवेदनशील क्षेत्रों के ५० लाख निवासियों में मुट्ठी भर मुसलमान ही इसके लिए दोषी ठहराए गए. लारेंट बोनेली के अनुसार, शहरी रंगभेद की प्रक्रिया ने वर्तमान हिंसा के माहौल को बढ़ावा दिया. फ्रांस के समंवयवादी माडल से कड़ा मतभेद और जातिभेद ने अरब व काले लोगों को भयभीत कर दिया. इस्लामिक समाज पर विवादों का छाया धूमपट इस सत्य के उजागर होने से दूर हो गया.

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