अमेरिकाः डगमगाती विश्वसनीयता

अमेरिका के राष्ट्रपति बुश का कहना है कि उनका देश किसी को प्रताड़ित नहीं करता. क्या उनके इस कथन पर विश्वास किया जा सकता है? इसका उत्तर शायद 'ना' होगा,

इग्नासियो रामोनेट
लैटिन अमेरिकी देशों की पांच दिन की अपनी यात्रा की समाप्ती पर ७ नवंबर को पनामा में राष्ट्रपति बुश ने कहा कि "हम किसी को प्रताड़ित नहीं करते". यह वही क्षेत्र है जिसने वाशिंगटन समर्थित तानाशाही को लंबे समय तक महसूस किया और बड़े पैमाने पर प्रताड़ना के अपराधबोध से ग्रसित था.

संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति वाशिंगटन पोस्ट के उस लेख पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे जिसमें अमेरिका के खुफिया एजेंसियों द्वारा अमेरिका से बाहर गुप्त स्थानों पर अवैध तरीके से युद्ध बंदियों को रखे जाने की आलोचना की थी. इन कटु सत्यों से साक्षात्कार के बाद भी क्या हम राष्ट्रपति बुश पर विश्वास कर सकते हैं? इसका उत्तर शायद 'ना' है.

ईराक पर हमले की योजना के समय उन्होंने कहा था कि सद्दाम हुसैन के शासन के तार अल कायदा से जुड़े हैं और बगदाद के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं. इन दो असत्य बातों ने वाशिंगटन के हमले का रास्ता साफ किया जिसमें दस हजार लोगों की जानें गई जिसमें दो हजार अमेरिकी सैनिक भी शामिल थे.

राष्ट्रपति बुश के बयानों पर विश्वास नहीं किया जा सकता. प्रताड़ना के मुद्दे पर भी नहीं. विभिन्न संगठनों, इंटरनेशनल रेड क्रास, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट वाच की रिपोर्टों ने इन संदेहों को पुख्ता किया कि ११ सितंबर २००१ के बाद अमेरिकी अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में जेनेवा समझौते और संयुक्त राष्ट्र संघ के समझौते को धता बता दिया.

9/11 के तुरंत बाद आनन फानन में विशेष न्यायालयों का गठन और अमेरिकन परिसीमा व अधिकार क्षेत्र से बाहर गुआंटानामों में अवैध बंदी केंद्र बनाए गए. इन बंदीगृहों में युद्ध क्षेत्र से पकड़े गए लड़ाकुओं (जो युद्धबंदी की तरह नहीं थे, इसलिए जेनेवा समझौता लागू नहीं होता) के लिए बुश प्रशासन ने सारे नियम कायदे ही बदल दिए.

अमेरिका के एटार्नी जनरल तथा राष्ट्रपति के पूर्व सलाहकार अल्बर्टो गोंजालेज ने इस नई रूढ़िवादी बहस को हवा दी कि अमेरिका को अपने मानवाधिकारों के सम्मान के सामने कमजोर नहीं पड़ना चाहिए. अपनी दो रिपोर्टों में जो फरवरी व अगस्त २००२ में प्रकाशित हुईं, गोंजालेज ने प्रताड़ना के नियम को फिर से रेखांकित किया. यह नया नियम केवल अमेरिका के लिए था जिसमें प्रताड़ना के लिए "कैदियों के आपसी संपर्कों को भंग करना" शब्द का प्रयोग किया गया.

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अफगानिस्तान के बगराम में दिसंबर २००२ से लेकर अब तक कैदियों को प्रताड़ित करने का कार्य अमेरिकी सैनिक बेस में आम है. जिस किसी पर संदेह होता है उसे पीटा जाता है व हथकड़ी लगा दी जाती हैं. एक कैदी जो यहां पकड़ा गया उसे लात घूसों से पीटा गया, दीवारों व मेज पर घसीटा गया और पानी की तेज धार उसके मुंह पर तब तक मारी गई जब तक कि उसकी सांसे न अटकने लगें. इस तरह से प्रताड़ित होने के कारण कई कैदियों को जान से हाथ धोना पड़ा.

न्यूयार्क टाइम्स ने इस बारे में एक जांच की और इस इस बात में सच्चाई पाई कि अमेरिकी सेना के लिए यह सामान्य घटना थी तथा अधिकतर मामलों में अभी तक बंदी बनाए गए लोगों से पूछताछ नहीं हो पाई है.

इस जांच में यह पूरी तरह साफ हो गया कि अमेरिका की ५१९वीं खुफिया बटालियन ने जो तकनीक सीखी थी उसका गुआंटानामो खाड़ी के बगराम में प्रयोग किया गया. इसी बटालियन ने इराक के अबू गरीब जेल में कैदियों से कड़ी पूछताछ किया था.

दूसरी कई जांचों में यह पाया गया कि सीआईए विश्व भर में खासतौर पर जर्मनी, इटली, स्वीडेन और अन्य देशों से संदेह के आधार पर लोगों को उठाकर अपने मित्र देशों सऊदी अरब, जार्डन और मिश्र में उन्हें बंदी बनाया जा रहा है जहां बिना किसी बाधा के उनको प्रताड़ित किया जा सकता है.

हाल ही में इस प्रकार की खबरें आईं कि सीआईए विश्वभर में अपनी गुप्त जेले बनाए हुए है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस "आधुनिक बंधुआ मजदूर कैंपों" के बारे में खुलासा किया है जिसमें कुछ यूरोपीय संघ के देशों (पोलैंड?) व पूर्वी यूरोप (रोमानिया?) का नाम आया है.

नैतिक व वैधानिक असंगतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार के खुलासे अमेरिका के लिए घातक हैं. आतंकवाद का सामना कर रहे विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों के विपरीत अमेरिका में यंत्रणा का सवाल गंभीर राजनीतिक द्वंद्व का रूप ले चुका है.

प्रताड़ना के मुद्दे पर गंभीर रूख अपना चुके अमेरिका के उपराष्ट्रपति डिक चेनी के साथ वाद विवाद में रिपब्लिकन सिनेटर जान मैककेन ने कहा कि एक लोकतांत्रिक देश को मानवाधिकारों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए और इसकी ताकत प्रताड़ना जैसे कार्यों को भूल जाने में ही निहित है.
(सौजन्य से: ली मोंड डिप्लोमेटिक)