राजनीतिक गलियारों में फोन टैपिंग का खेल

ताकतवर लोग सरकार गिराने के खेल में फोन टैपिंग का सहारा लेते हैं

संजय कपूर
फोन टैपिंग के बारे में मेरे अनुभव कुछ अलग ही हैं. मैं इस पर ध्यान भी नहीं देता, न तो फोन पर, जो कि टैप किया जा रहा है और न ही उनके ईरादों के बारे में जो ऐसा कर रहे हैं. वे केवल यह कहकर शांत हो जाते कि "क्या तुम निश्चित समयांतराल के बाद क्लिकिंग साउंड सुनते हो"? इसका मतलब यह है कि हमारी बातचीत टैप हो रही है. पुलिस सूत्रों से अपनी जानकारी के लिए यह तथ्य बड़ी मुश्किल से मैने खोज निकाला.

१९९० में जूनियर रिपोर्टर पद पर कार्य करते हुए सूत्रों से पता चला कि मेरा फोन सर्विलांस में है. परिस्थितियों ने मुझे सरकार को अस्थिर करने वाले लोगों के पास पहुंचाया था. पूरा वाकया इस प्रकार है कि उस समय के प्रधानमंत्री वीपी सिंह उपप्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल से गहरे मतभेदों के दौर से गुजर रहे थे. चौधरी देवी लाल की निगाहें ऊंची कुर्सी पर थी जो कांग्रेस के साथ जोड़ तोड़ में लगे थे. वे १९७७ की घटना के जवाब में जनता दल सरकार को गिराना चाहते थे. चौधरी देवी लाल अरुण नेहरू व मुहम्मद खान के खिलाफ कार्रवाई चाहते थे जो बोफोर्स कांड समेत अन्य मामलों में शामिल थे और वीपी सिंह के काफी करीबी थे. प्रमाण के लिए, उन्होंने तथाकथित तौर पर वीपी सिंह द्वारा लिखे गए पत्र को तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को सौंपा जिसमें अरुण नेहरू व मुहम्मद खान के खिलाफ बोफोर्स व फास्फोरिक खरीद मामले में जांच की मांग की गई थी और ये दोनों ही राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में शामिल थे. इस प्रकरण से नाराज प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने इसे फर्जी बताया. इस विवाद में अशरफ केंद्रीय भूमिका में था जो कभी वीपी सिंह का नीजी सचिव था. अशरफ ने ही यह पत्र देवी लाल के नीजी सचिव केके दीपक को उपलब्ध कराया था.

वीपी सिंह चाहते थे कि देवीलाल जब तक इस प्रकरण से साफ सुथरे नहीं निकल जाते उन्हें कैबिनेट से हट जाना चाहिए. अपनी इस कहानी में मैने एक बिचौलिए की मदद ली जो वीपी सिंह और उनके तौर तरीको को पसंद नहीं करता था. उसने मुझे उनका सलाहकार रखवाया जिससे कुछ दिनों बाद मैं चौधरी देवी लाल के आंतरिक घेरे में था जिसपर संकट के बादल थे.

उनके बहुत से बिचौलियों में से एक ने सुझाया कि चौधरी देवी लाल की स्थिति बहाल हो सकती है यदि अशरफ, जो वीपी सिंह का पूर्व सचिव था, लिखित रूप से यह स्वीकार करे कि उसने ही यह पत्र उनके नीजी सचिव दीपक को दिया था और उसे याद है कि यह पत्र उसके बास ने ही लिखा था. यह प्रकरण मेरी स्मृतियों में अच्छी तरह नहीं रहा लेकिन ऐसा प्रभाव था कि अशरफ यह अफिडेविट सिर्फ मुझे ही दे सकता है.

अशरफ ने मेरे घर के बगल वाले रेस्टोरेंट में एक मीटिंग रखी. मैं फोन रखने ही वाला था कि यह फिर से बजने लगा. इसे जब मैने रिसीव किया तो केवल मेरा नाम चेक किया गया उसके बाद यह कट गया. इसके बाद ब्लैंक काल्स मेरा पीछा करती रहीं. रेस्तरां में अशरफ ने मुझसे कहा कि वह सर्विलांस में है और कुछ दूर पर खड़ी एक कार की तरफ ईशारा किया. उसने मुझसे कहा कि यह सरकार की स्थिरता का सवाल है और इंटेलिजेंस ब्यूरो जानना चाहेगी कि देवी लाल और उनके आदमी मुझसे क्या चाहते हैं. जब मैने उसे ब्लैंक काल्स के बारे में जानकारी दी तो वह मुस्कराया और कहा कि मेरे दोस्त तुम भी सर्विलांस में हो.

अशरफ अफिडेविट दिखा नहीं सका और मैं लगातार निगरानी में रहा. यद्यपि यह बहुत ही असुविधाजनक था लेकिन इस असुरक्षित दिल्ली में मेरी कोई निगरानी रख रहा था. कुछ दिनों बाद देवी लाल को पद से हटा दिया गया और बाद में मैं जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण नहीं रहा. १९९६ में मेरे शुभचिंतकों ने बताया कि मैं फिर उनकी निगरानी में हूं. उस समय मैने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इससे जाहिर है कि इंटेलिजेंस एजेंसियां उनका फोन टेप कराती हैं जो उनके व सरकार की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है.

अमर सिंह का मामला इसके लिहाज से महत्वपूर्ण था. हांलाकि यह और मामला है कि यह किसी के मूलभूत अधिकारों का हनन करता है या नहीं. कोई भी सरकार या उसका विरोधी जानना चाहेगा कि उनके खिलाफ क्या रणनीति बन रही है. वे यह जानना चाहते हैं कि वे यूपीए सरकार को गिराने के लिए कोई गठबंधन सरकार तो नहीं बनाना चाहते हैं. यदि मनमोहन सिंह यह नहीं जान पाएंगे कि उनके विरोधी कैंप में क्या हो रहा है तो वे यह अनुमान नहीं लगा सकते कि सरकार कितनी दिन चलेगी. क्या यूपीए और उसके घटक दल यह बर्दाश्त कर सकते हैं?