ड्रीम बजट का दुःस्वप्न

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सामने हैं ऐसे में वित्तमंत्री को समुचित बृद्धिदर प्राप्ति और बजट घाटे को कम करने का लक्ष्य रखते हुए गठबंधन राजनीति को तुष्ट करना होगा

एन चंद्र मोहन, दिल्ली
केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ड्रीम बजट के लिए बेहतर तरीके से जाने जाते हैं, हांलाकि बाद में वे वित्तीय दुःस्वप्न में बदल जाते हैं. सर्वांगीण विकास में ये टेक्स में कमी का वादा करते हैं और उन्हें शहरी मध्यम वर्ग और व्यवसायी वर्ग में काफी लोकप्रिय बनाते हैं.

केंद्र की सत्तासीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में वाम दल सहयोगी हैं इसलिए भी उन्हें राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम (एनसीएमपी) के तहत ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना व भारत निर्माण का बजट अधिक रखते हुए खर्च व राजकोषीय घाटा को संतुलित करना होगा.

आम बजट केंद्रीय सरकार के राजस्व का वार्षिक लेखा जोखा होता है. राजकोषीय घाटा उस समय होता है जब प्रशासन का खर्च कर राजस्व से अधिक हो जाता है. ठीक इसी परिस्थिति में किसी व्यक्तिगत या प्रतिष्ठान की तरह ही इसे खर्च कम रखना होगा अन्यथा उधार का रास्ता खुला है.

उधार का दूसरा नाम ही राजकोषीय घाटा है. हांलाकि बजट एक अवसर है जब यूपीए सरकार का सुधारों पर दिशा तय होगा जैसे कि बीमा और रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और मुख्य रूप से उनका लक्ष्य वित्तीय घाटा कम करने का होगा.

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम को २८ फरवरी २००६ को दूसरा ड्रीम बजट पेश करने में जो जटिलताएं आएंगी वह निश्चित तौर पर राजस्व संबंधित जिम्मेदारियां व बजट मैनेजमेंट एक्ट (एफआरबीएम) २००४ है, जिसके अंतर्गत राजस्व घाटे को वर्ष २००४-०५ से प्रारंभ करके सकल घरेलू उत्पाद के .५ प्रतिशत तथा वित्तीय घाटे को .३ प्रतिशत तक प्रत्येक वर्ष कम करना होगा.

सरकार के सहयोगी वाम दलों ने विनिवेश या सार्वजनिक कंपनियों में अपना हिस्सा बेचकर वित्तीय घाटा कम करने के लिए स्पष्ट रूप से चेताया है, जबकि वित्तमंत्री ने प्रत्येक फोरम पर विनिवेश की वकालत की है. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार और इसके सहयोगी दल इस साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों ने चिदंबरम के सब्सिडि में कमी करने जैसे प्रयासों में हाथ बंधे हैं. हाल ही में इसका उदाहरण देखने को मिला जब यूपीए सरकार ने २००५-०६ में फूड सब्सिडि बिल को समाप्त करने का फैसला स्थगित करना पड़ा जिसमें बजट से २६,२०० करोड़ रूपए बढ़ोत्तरी की आशा की गई थी. इन परिस्थितियों में निर्गमन मूल्य में बढ़ोत्तरी और सब्सिडि बिल में कमी के लिए खाद्यान्न वितरण में कटौती का फैसला चुनावों तक टाल देना कहीं से भी उचित नहीं है.

पहले दिन से ही इसे ड्रीम बजट का नाम देना अच्छा नहीं है. आर्थिक लेखकों के एक मंच पर वित्त मंत्री ने कहा कि यह इस वित्तीय वर्ष की समाप्ती पर होना चाहिए था. उन्होंने कहा कि बजट में सरकार की अन्य बड़ी योजनाओं से यदि ७ या ७.५ प्रतिशत कि बृद्धि दर प्राप्त होती है तो यह अच्छे बजट की श्रेणी में रखा जाएगा.

उन्होंने २००६-०७ में राजस्व घाटे में जीडीपी की .५ प्रतिशत से घटाकर २.२ तथा वित्तीय घाटे को जीडीपी की .३ प्रतिशत से घटाकर .४ प्रतिशत तक कटौती का संकेत दिया जबकि उन्होंने कर की दर नहीं बढ़ाये जाने का वादा किया था.

भारत की स्वस्थ और तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था से चिदंबरम का विश्वास काफी बढ़ गया है जिसकी २००५-०६ के दौरान दो तिमाही में ८ फीसदी तथा वार्षिक वृद्धि दर ७.५ से ८ फीसदी रही है. उनके सभी बजट से उम्मीद लगायी जा रही है कि बाजार में यह तेजी अगले कुछ सालों तक जारी रहेगी जिसकी वार्षिक वृद्धि दर ७ से ८ प्रतिशत तथा मुद्रास्फीति की दर ४ से ५ फीसदी तक रहेगी.

आज के दौर में यह विश्व में तेजी से विकसित होती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त हालात हैं जिससे भारत के वित्तमंत्री को उम्मीद है कि उनके बजट से वृद्धि में तेजी आएगी.

कर राजस्व में उछाल पर जीडीपी की वृद्धि दर निर्भर करती है. २००६-०७ के अलावा अन्य वर्षों में केंद्रीय सरकार की टेक्स दर जीडीपी के अनुपात में काफी बढ़ गई है. नए टेक्स लगाने के दौर में वित्त मंत्रालय अधिक धन प्राप्त होने की उम्मीद करता है.

वित्त मंत्रालय जब अधिक सेवाओं को कर के दायरे में ला रहा है तो कर प्रशासन का भी स्वर ऊंचा हो गया है. चिदंबरम कर राजस्व को कम करने के पक्ष में नहीं हैं और पिछले बजट में प्रावधान किए गए फ्रेंज बेनिफिट टैक्स जैसे अलोकप्रिय कदमों को पीछे खींचने की बजाय इसमें सुधार लाना चाहते हैं.