लोकतंत्र के दो स्तंभ आमने-सामने

संसद सदस्यों को सदन से निष्कासित करने के अधिकार की संवैधानिक वैधता को पहले कभी चुनौती नहीं दी गई. अब अवसर यह निर्णय करने का है कि ऐसे मामलों में संवैधानिक वैधता का अधिकार किसके पास है?

विजय सांघवी
संविधान निर्माताओं ने संसद सदस्यों की भविष्य की पीढ़ियों में अपना विश्वास जताया था कि वे संविधान का उपयोग लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने में नहीं करेंगे. उन्होंने संविधान में ऐसा प्रावधान किया जिस पर कोई संवैधानिक प्रतिबंध नहीं था. सवाल पूछने के बदले पैसे लेने पर एक स्टिंग आपरेशन में पकड़े गए लोक सभा के दस सांसदों की सदस्यता समाप्त करने को कानूनी चुनौती कुछ निश्चित संवैधानिक मामलों पर स्पष्टीकरण की मांग करती है.

संविधान के अनुच्छेद १०१, १०२, १०३, १०४ और १०५, संसद की कार्यवाही की स्पष्ट व्याख्या करते हैं. इसके अनुसार किसी भी न्यायालय को संसद की कार्यवाही, प्रस्तावों, कार्यों या मंत्रियों, सदस्यों के वक्तव्यों, मतदान और यहां तक कि अनियमितताओं पर उंगली उठाने का अधिकार नहीं है.

संविधान के अनुच्छेद १२२ (१) के अनुसारः सदन की कार्यवाही की वैधानिकता व अनियमितता पर किसी भी स्तर पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता. न्यायाधीश दुर्गा दास बसु के अनुसार 'नियमों की व्याख्या (उनकी संवैधानिकता के अलावा) का काम लोकसभा अध्यक्ष और खुद सदन पर छोड़ देना चाहिए. लेकिन न्यायालय के दखल को केवल कार्यवाही की अनियमितता तक सीमित कर गैर कानूनी व असंवैधानिक का विभेद करना चाहिए.

यदि सदन की कार्यवाही बिना अधिकार क्षेत्र के चल रही है तो भी कोई प्रतिरोध नहीं होना चाहिए, जैसे कि संविधान के अनिवार्य तत्वों की अवज्ञा या इसके अधिकार क्षेत्र की समीक्षा कि विधायिका संविधान के स्वामित्व में नही है.' (कमेंटरी आन कांस्टीट्यूशन आफ इंडिया वा.जी, पेज १७६) अपने वक्तव्य की पुष्टि के लिए बसु, सुप्रीम कोर्ट के १९६० में शर्मा बनाम श्री कृष्णा मामले पर दिए गए फैसले का उल्लेख करते हैं.

यहां बसु संविधान के अनुच्छेद १२२ का भी उल्लेख करते हैं जिसमें कोर्ट को कानून बनाने वाली संस्था की जांच करने से नहीं रोका जा सकता जो उस विधानमंडल की क्षमता में नहीं है या संविधान के प्रावधानों के प्रतिकूल है.

एक दूसरे मामले में भारत के संघीय न्यायालय (उमायल बनाम लक्ष्मी, अनुच्छेद १९४५, एफसी.२५{३९}), द्वारा कहा गया कि 'यह केवल सदन की कार्यवाही या कानून बनाने वाली विधायिका का अवलोकन भर नहीं है.' यह विधायिका की कार्यप्रणाली की क्षमता पर सवाल उठाया गया है. यह सवाल केवल कानून बनाने वाली संस्था की कार्यवाही पर स्थायी नियम बनाने का नहीं है बल्कि संविधान में प्रावधान करने व उसकी व्याख्या किए जाने का है जिसमें विधायिका की विधायी शक्तियां निहित हैं.

वर्तमान में उपजे मामले को देखें तो सदस्यों के निष्कासन के प्रस्ताव को न्यायालय में चुनौती संसद की कार्यवाही के समय नहीं आया बल्कि जब यह प्रस्ताव सदन में पास हो गया तब यह सदन की कार्यवाही की समाप्ती पर आया. कोर्ट में दायर की गई इस याचिका में सदन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है जिसमें कहा गया कि सदन के पास यह अधिकार नहीं है कि वह किसी सदस्य को अयोग्यता के अलावा किसी अन्य मसले पर निष्कासित करे जिसका संविधान के विभिन्न प्रावधानों में अच्छी तरह से व्याख्या किया गया है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने निष्कासन के इस ड्रामे में सम्मिलित लोगों के खिलाफ कानूनी नोटिस जारी किया.

यद्यपि पहले भी दोनों सदनों में निष्कासन की घटनाएं हो चुकी हैं. लेकिन संवैधानिक वैधता और दोनों सदनों के अधिकारों का मामला पहली बार आया है क्योंकि इससे पहले किसी ने भी इसको कोर्ट में अधिकारों को लेकर चुनौती नहीं दिया था.

निष्कासन की पहली घटना २४ सितंबर १९५१ को हुई जब अस्थायी लोकसभा में मुंबई से सांसद जीपी मुदगल को बांबे बुलियन हाउस के हित में सदन में प्रश्न पूछने और बदले में धन प्राप्त करने के अलावा हाउस के पक्ष में कुछ निश्चित बिल संशोधन पास कराने का दोषी पाया. हांलाकि उन्होंने प्रस्ताव पास होने से पहले ही अपना इस्तीफा सौंप दिया लेकिन वह मंजूर नहीं हुआ और वे सदन से बाहर हो गए.