कांग्रेस को उत्तराधिकारी की तलाश

राहुल गांधी अभी पार्टी में अगला कदम उठाने को तैयार नहीं दिखते

केसी अलेक्जेंडर, दिल्ली
नेहरू-गांधी परिवार का इतिहास उन लोगों के लिए मददगार साबित नहीं हो रहा जो राहुल गांधी को पार्टी में अधिक जिम्मेदारी संभालने का रास्ता देख रहे हैं. इंदिरा गांधी जब बड़ी हुईं तो उन्होंने कभी भी अपने पिता का साथ नहीं छोड़ा. पार्टी में उनका पदार्पण स्वाभाविक था. अपने पिता जवाहर लाल नेहरू के तगड़े राजनीतिक तंत्र में उनके करीबियों और समर्थकों से अपने संबंध मजबूत करती हुईं वे एक रास्ते से दूसरे रास्ते पर राजनीतिक अनुभवों में परिपक्व होती गईं.

इंदिरा गांधी ने राजनीति का पाठ और नेतृत्व का गुर अपने पिता और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल अन्य महान लोगों से सीखा था. राजनीति में उनका नेतृत्व प्राकृतिक और निर्विवाद था. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कितनों ने उन्हें तब जाना जब ओपिनियन पोल ने उन्हें अब तक का सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री माना.

इंदिरा गांधी, अपने बड़े पुत्र संजय को कठिन परिस्थतियों के समय सहायता के लिए विशेष रूप से तैयार किया था. संजय गांधी ने अपने खुद के समर्थक बनाए और राजनीति को जीवन में आगे बढ़ने का हथियार मानने वाले ढ़ुलमुल विचारधारा वाले लोगों में खुद का नेटवर्क विकसित किया. वे काफी आक्रामक थे और स्वतंत्रता संघर्ष का जज्बा रखने वाले लोगों के बारे में ज्यादा चिंता नहीं करते थे. वे एक अलग पीढ़ी और विचारधारा के प्रणेता थे.

संजय गांधी पार्टी में जनरल सेक्रेटरी बनाए गए और कुछ ही समय में वे पूरी पार्टी पर प्रभावी होकर मां के सहयोगी हो गए. उनकी असमय मौत ने सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया. अब उनके बड़े बेटे राजीव जो कि एक पायलट थे, उन्होंने उनके साथ शुरूआत की और पार्टी के कार्यों में हाथ बंटाने लगे. वे पार्टी के जनरल सेक्रेटरी बनाए गए ‌और उद्योगों के प्रतिनिधियों और नौकरशाहों के साथ मुलाकात का सिलसिला प्रारंभ कर दिया.

१९८२ में एशियाई खेलों के सफल आयोजन ने राजनीतिज्ञों ‌और नौकरशाहों के बीच उनका काफी मजबूत नेटवर्क बन गया. इससे लोगों में यह भी संदेश गया कि आधुनिक विचारों वाले युवा राजीव गांधी ही देश को २१वीं शताब्दी में ले जा सकते हैं. उनकी यह छवि उनकी मां की हत्या हो जाने के बाद प्रधान‍मंत्री बन जाने तक रही.

राहुल गांधी जब अमेठी से चुनाव जीतकर लोक सभा सदस्य बने तो लोगों ने यही कयास लगाया कि वह भी अपने पिता की तरह ही सक्रिय राजनीति में धमाकेदार कदम रखेंगे. वह कांग्रेस वर्किंग कमेटी से जुड़कर पार्टी के जनरल सेक्रेटरी बनाए जाएंगे.

हाल ही में जब सोनिया गांधी ने पार्टी को नया रूप देना प्रारंभ किया तो पार्टी इस बात पर काफी उत्सुक थी कि राहुल गांधी भी कार्यसमिति में सम्मिलित हो जाएंगे. लेकिन बाद में यह खबरें आईं कि वे हैदराबाद सम्मेलन में पार्टी की कार्यसमिति में शामिल होंगे.

सत्र प्रारंभ होने के पहले ही दिन राहुल गांधी से नजदीकियां प्रदर्शित करने के लिए नेताओं में मारा मारी मची रही. पार्टी के सदस्यों ने यह भी मांग की कि राहुल गांधी को मंच पर बैठना चाहिए. राहुल गांधी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सदस्यों ने चापलूसी में नारे लगाए तथा चीखा चिल्राया. पार्टी के लोगों के भारी अनुरोध को देखते हुए अंत में वे समापन सत्र को संबोधित करने के लिए तैयार हो गए.

बहुत से राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने "वी वांट राहुल" का नारा पढ़ा और उन्होंने इस बात में अविश्वास जताया कि पार्टी उनकी मां द्वारा संचालित की जा रही है. सत्ता में होते हुए भी कांग्रेस की हालत यह है कि वह राजनीतिक रूप से प्रमुख सभी राज्यों में हथियार डाल चुकी है. खासकर हिंदी के हृदय प्रदेशों में इसकी हालत काफी खराब है जहां कि यह कभी सबसे प्रभावी पार्टी हुआ करती थी. पार्टी के नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी समस्या उसके सहयोगी दल हैं जो पार्टी को लाभ लेने में दिक्कतें खड़ी कर रहे हैं. चुनावों में उसके सहयोगी लालू प्रसाद यादव व सिबू सोरेन चुनाव हार गए. इस साल तमिलनाडु में होने वाले चुनावों में भी इसकी कोई गारंटी नहीं है कि डीएमके और उसके सहयोगी दल चुनाव जीत जाएं.