जम्मू और कश्मीर समस्या के ग्यारह संभावित हल हैं, लेकिन देखना यह है कि कौन ज्यादा प्रभावी है?
इफ्तिकार जिलानी, श्रीनगर
भारत में आतंकवाद और पाकिस्तान के बलूचिस्तान की घटना पर तू-तू मै-मै के बाद नियंत्रण रेखा की यथास्थिति और उससे हटकर दोनों देश कश्मीर समस्या का हल खोजने पर सहमत हुए हैं. ऐसा पहली बार हुआ है कि भारत ने सचिव स्तर की बातचीत की समाप्ती पर पाकिस्तान को सरकारी तौर पर यह संदेश दिया कि इस समस्या के समाधान के लिए सीमा से छेड़छाड़ और जम्मू कश्मीर की संप्रभुता की समाप्ती के अलावा किसी भी मुद्दे पर बातचीत का इच्छुक था.
भारत के विदेश सचिव श्याम सरन ने कहा कि "भारत की कुछ राजनीतिक सीमाएं हैं. हम इस स्थिति में नहीं हैं कि सीमाओं के साथ छेड़छाड़ करें. इस मसले पर हमारा इरादा यह है कि जो कुछ भी कश्मीर की जनता के लिए सुविधाजनक, निर्बाध आवागमन और विचारों के लिए उपयुक्त है, हम उस पर बातचीत के लिए तैयार हैं".
पिछले पंद्रह साल से शांति की तरफदारी करने वाले लोगों और विशेषज्ञों द्वारा इस समस्या के समाधान के लिए विभिन्न माडल सुझाए गए जो दोनों देशों के राजनीतिक मापदंडों में सटीक बैठते हैं. इन समाधानों के संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं.
१- एलैंड आइलैंड माडल
पूरे विश्व में अल्पसंख्यकों के बीच चल रहे संघर्ष के समाधान के लिए राजनीतिज्ञ, एकेडमिक और पत्रकार, एलैंड को सफल माडल के रूप में अध्ययन करते हैं. एलैंड और फिनलैंड में शक्ति विभाजन वह सिद्धांत है जो बंटवारे के किसी भी संशोधन में दोनो पक्षों की सहमति आवश्यक है.
एलैंड की स्वायत्तता में निवास का अधिकार, जमीन खरीदने पर पाबंदी और अंतरराष्ट्रीय संधियों को प्रभावित करने जैसे कुछ बिंदु हैं जिसने विश्व के पर्यवेक्षकों को बड़े पैमाने पर अपनी ओर आकर्षित किया है. कुछ कारणों से एलैंड का मामला अपने आप में अनोखा है. इसकी स्वायत्तता बहुत समय से चली आ रही है. इसका हल बिना सैनिक हस्तक्षेप के हुआ है और एलैंड स्वशासन और असैनिक दोनों ही है.
२-साउथ टाइरोल माडल
१९४६ में हुए पेरिस समझौते के अनुसार (इसको ग्रूबर-डेगास्परि समझौता भी कहते हैं) और १९६९ के साउथ टाइरोल पैकेज में आस्ट्रिया ने इटली के साथ आमने-सामने संरक्षणात्मक रूप में आस्ट्रिया के लोगों व लेडिन अल्पसंख्यकों से मामलों के हल के लिए दक्षिणी टाइरोल में चल रही वार्ता को समर्थन मिला. इसका उद्देश्य जर्मन और साउथ टाइरोल के लेडिन भाषी लोगों के पारंपरिक, सांस्कृतिक, और आर्थिक अस्तित्व को सुरक्षित रखना है. इसके अतिरिक्त सबसे महत्वपूर्ण बात बोलाजानो क्षेत्र के विभिन्न भाषा-भाषी समूहों के बीच शांति व सहअस्तित्वपूर्ण संबंध स्थापित करना है.
३- उत्तरी आयरलैंड शांति प्रक्रिया
उत्तरी आयरलैंड की लगभग ५५ प्रतिशत जनसंख्या प्रोटेस्टेंट और ४५ प्रतिशत कैथोलिक, और ये दोनो ही समुदाय अपनी समस्याओं के लिए एकदूसरे पर जोर देते रहे हैं. प्रोटेस्टेंट मुख्यतः संवैधानिक मामलों और सुरक्षा को लेकर विवाद खड़ा करते हैं और प्राथमिक तौर पर संघ को ब्रिटेन के साथ रखने और संगठित आयरलैंड के खतरों का विरोध करते हैं.
कैथोलिक लोगों के विचारों को हम दो भागों में विभाजित कर सकते हैं. कुछ लोग इस बात से सहमत हैं कि राष्ट्रीयता का संघर्ष स्वयं को सुनिश्चित करने के लिए है. वे पीछे देखते हैं कि द्वीप के विभाजन व ऐतिहासिक समंवय से इसका क्या संबंध है. दूसरा दृष्टिकोण वर्ष १९२० और १९७० के बीच भ्रष्टाचार की समस्या, या सरकार द्वारा अनैतिक कार्यों में लिप्तता का है. यदि इन मुद्दों को अलग रख दिया जाए तो कैथोलिक व प्रोटेस्टेंट दोनों ही एकसाथ बिना किसी मतभेद के रह सकेंगे.
१९९८ का गुड फ्राइडे समझौता पांच संवैधानिक बिंदुओं पर आधारित था. पहला यह कि उत्तरी आयरलैंड के लोगों के भविष्य की संवैधानिक स्थिति लोगों के हाथों में थी. दूसरा, यदि आयरलैंड के उत्तरी व दक्षिणी क्षेत्रों के लोग भविष्य में एक होना चाहें तो वे मतदान द्वारा ऐसा कर सकेंगे. तीसरा, उत्तरी आयरलैंड की वर्तमान संवैधानिक स्थिति युनाईटेड किंगडम के अंतर्गत होगा. चौथा, उत्तरी आयरलैंड के लोग अपनी पहचान खुद रख सकेंगे और अपने को आइरिश, ब्रिटिश या दोनों ही रूप में स्वीकार कर सकेंगे. पांचवा यह कि आयरिश स्टेट उत्तरी आयरलैंड पर अपना सीमा संबंधी दावा छोड़ना होगा तथा आइरिश राष्ट्र अपनी सीमाओं को जमीन की जगह लोगों से चिंहित करे. लोगों की सहमति आइरिश संविधान के अंदर होनी चाहिए.
४-अंडोरा माडल
अंडोरा, पिरीनीज की एक छोटी सी जागीर है जिसका स्वामी फ्रांस का राष्ट्रपति व चर्च का विशप अर्जेल का होता है. अंडोरा की सरकार व संविधान व्यवस्था अपनी है तथा आंतरिक मामलों पर उसे स्वायत्तता है. बाहरी मसलों पर चर्च के पादरियों की भूमिका महत्वपूर्ण है. अन्य क्षत्रों (उत्तरी राज्यों का पाकिस्तान, जम्मू और लद्दाख का भारत के साथ) में जो आदर्श स्थिति चल रही है वह घाटी में भी कायम की जा सकती है.
यहां का मुस्लिम समुदाय भारत सरकार के नियमों से खुश नहीं है इसलिए अंडोरा माडल को यहां लागू किया जा सकता है. इसका मतलब है कि घाटी में भारत को सुरक्षा और विदेशनीति के मामलों में पाकिस्तान के साथ साझा रणनीति अपनाकर आंतरिक और सांस्कृतिक मामलों में स्वायत्तता कायम करनी होगी. पाकिस्तान इस माडल को अपनी जीत के तौर पर दिखा सकता है कि वह घाटी के मुस्लिम समुदाय के हित के लिए अप्रतक्ष्य रूप से भारत के साथ कुछ करना चाहता है.
५- स्पेन के बास्क संघर्ष का इबारीक्सी प्रस्ताव
बास्क समझौता मुख्यतः तीन आधारभूत बातों पर आधारित था.
१-बास्क समुदाय की अपनी पहचान है. २-उन्हें अधिकार है कि वे अपने हितों का फैसला खुद कर सकें.
वर्तमान में बास्क समुदाय तीन वर्गों बंटे हुए हैं. एक तरफ तो स्वायत्तशासी बास्क समुदाय है जो अलावा, बिजकाया और जिपुजकोआ और नवारे प्रांत से मिलकर बना है. दोनों ही प्रांत स्पेनिश राज्य के अंतर्गत आते हैं. दूसरे वर्ग में इपाराल्डे, लपूरडी, जूबीओरा और बेनाफोरा है जो फ्रांस राज्य में स्थित हैं और उनका अपना राजनीतिक प्रशासन नहीं है.
६- ट्रीस्टे माडल
ट्रीस्टे की स्वतंत्र सीमा का यह एक सबक है कि इटली और युगोस्लाविया ने १९५४ तक उसकी संप्रभुता को बांट लिया था. एजी नूरानी ने इस पर कहा कि ट्रीस्टे फार्मूला कुछ नहीं बल्कि धार्मिक विभाजन है तथा ओसीमो संधि के साथ जो ट्रीस्टे के पोर्ट शहरों को इटली तथा क्रोट स्लोवीन द्वारा रक्षित इस्त्रियन भाग को यूगोस्लाविया को सौंपना है.
७- समी माडल
इसका एक और रचनात्मक उदाहरण समी पार्लियामेंटरी असेंबली है जो २००० में स्थापित हुई थी. यह समी के स्थानीय लोगों की संयुक्त फोरम के तौर पर स्थापित हुई थी जो नार्वे, स्वीडेन और फिनलैंड के उत्तरी भाग में रहते हैं. समी अपने प्राचीन गृहजिले की जमीन, जल और प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण की मांग कर रहा है. वे अपने क्षेत्र के प्रतिनिधियों का खुद चुनाव करते हैं लेकिन अब वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए "अखिल समी राजनीतिक संस्था" चाहते हैं.
समी के मामले के हल के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने संज्ञान लिया और नार्वे की नाटो के लड़ाकू विमानों के लिए बृहद स्तर पर बम्ब बरसाने का निर्णय इस संप्रभु राज्य की सीमाओं को प्रभावित किया. समी का मामला एक प्रयास है कि विभाजित लोग भी नीचे से महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाओं का निर्माण कर सकते हैं जबकि उपर से वे विभिन्नता दर्शाते हैं.
८- न्यू कैलीडोनिया माडल, नौमिया समझौता
१७७४ में अंग्रेज कैप्टेन जेम्स कुक द्वारा इस द्वीप की खोज की गई थी. १८५३ में नेपोलियन तृतीय के नेतृत्व में फ्रांस ने इस पर अधिकार कर लिया. १९९९ में न्यू कैलीडोनिया पर नोमिया समझौता हुआ जहां की स्थानीय कनक निवासियों, यूरोपियन व अन्य गैर मलानेसियन से संख्या में ज्यादा हो गए. उपनिवेश के कारण उनकी फ्रेंच नागरिकता थी और २० साल के क्रांतिक काल के बाद जनमत सर्वेक्षण द्वारा वे कैलीडोनिया की नागरिकता स्थापित कर रहे हैं. कश्मीर मामले में यह उदाहरण लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि कश्मीर किसी भी राष्ट्र का उपनिवेश नहीं है. लेकिन यहां कि विभाजित संप्रभुता एक महत्वपूर्ण तथ्य है.
९- अधिकतम स्वायत्तताः नेशनल कांफ्रेंस फार्मूला
जुलाई २००१ में फारूक अब्दुल्ला सरकार ने असेंबली में प्रस्ताव पास किया जिसमें १९५३ की स्थिति बहाल करने की बात कही गई थी और केंद्र सरकार के कानूनों से छुटकारे की मांग की थी. टीकाकार बी. वर्गीज भी इससे सहमत हैं कि शांति के लिए भारत को एक सक्रिय पूर्वधारणा बनानी होगी और जम्मू और कश्मीर पर कोई आंतरिक व्यवस्था कायम करना होगा.
उनका इस पर भी विश्वास है कि इसका प्रारंभिक समय १९५३ या अन्य कोई भी हो सकता है जहां जमीनी सत्यता को स्वीकार करते हुए दोनों को सहमति बनानी होगी. इस विचार पर आगे बात करते हुए दिल्ली के योजनाकारों ने एक रिपोर्ट में कहा कि दोनों तरफ से आदान प्रदान व सीमा को आसान बनाने के लिए आवागमन प्रक्रिया, अपराध नियंत्रण, व्यापार और आर्थिक प्रोटोकाल पर सहयोग तथा समंवय की जरुरत है.
इस प्रकार का ढ़ांचा बनाने पर यह संभव है कि जम्मू कश्मीर के दोनों तरफ से अनौपचारिक सह संघीय संबंध रखना संभव है. जम्मू और कश्मीर के दोनों ही भागों पर अपने अधिकारक्षेत्र में स्वायत्तता का स्वाद चख रहे हैं.
१०- चिनाब फार्मूला
जम्मू और कश्मीर चार जिलों में विभाजित है. पाकिस्तान शासित कश्मीर इस पर आंशिक रूप से निर्भर है. इसका उत्तरी क्षेत्र (पूर्व का जम्मू और कश्मीर का उत्तरी क्षेत्र) चीन के नियंत्रण का अक्साइ चीन क्षेत्र, पाकिस्तान का भाग है.
जम्मू कश्मीर और घाटी का शेष भाग भारत का अंग है जहां यह इसके संविधान का विशेष भाग है. चिनाब फार्मूले के अनुसार पाकिस्तान शकरगढ़ के उपनगर दोआब, चिनाब और रवि नदियों के बीच जमीन की एक पट्टी है जो चांब, डोडा और राजौरी जिलों तक फैली हुई है और वह उसे अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में चिन्हित कर सकता है.
इस "गिव एंड टेक" के अनुसार कारगिल भारत के भाग में जाना चाहिए लेकिन कारगिल से आगे भारत को पाकिस्तान को देना होगा, "आर्किटेक्ट की इस फार्मूले के अनुसार ऐसी राय है".
जम्मू और कश्मीर के भाग में जम्मू के बहुत से भाग और चिनाब के दाहिने किनारे का भाग हिंदू बहुसंख्यक है. जबकि चिनाब के पश्चिमी भाग में मुश्लिम समुदाय बहुतायत में हैं. पाकिस्तान पर शोध कर रहे लोगों का कहना है कि "पाकिस्तान भी बौद्ध बहुसंख्यक लद्दाख के भाग पर अपना दावा छोड़ सकता है लेकिन घाटी पर कोई समझौता नहीं होगा". घाटी आंशिक रूप से स्वायत्त होगी और भारत तथा पाकिस्तान के बीच सीमा रेखांकन में तहसील और कस्बों को बांटने की बड़ी चुनौती होगी. संक्षेप में चिनाब नदी दोनों देशों के बीच विभाजन रेखा बन जाएगी.
११- कश्मीर स्टडी ग्रुप फार्मूला
अमेरिका स्थित कश्मीर स्टडी ग्रुप को कश्मीर समस्या के हल के लिए अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा कि जम्मू और कश्मीर की पूर्व की स्थिति बहाल कर उसे पूर्ण स्वायत्त राज्य का दर्जा दे देना चाहिए जो दोनों ही देशों, भारत और पाकिस्तान से स्वतंत्र संबंध रख सके. प्रत्येक नया अस्तित्व अपना लोकतांत्रिक संविधान और नागरिकता, ध्वज और अपनी विधायिका रखना चाहेगा जो रक्षा तथा विदेश विभाग के अलावा सभी निर्णय ले सके.
भारत और पाकिस्तान इसकी रक्षा व पुलिस बल आंतरिक कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार होंगे. भारत और पाकिस्तान इसकी आवश्यकताओं के अनुसार वित्त व्यवस्था करेंगे. वर्तमान नियंत्रण रेखा यथास्थिति में बनी रहेगी जब तक कि दोनों देश इसे अपने हित में प्रयोग करना चाहेंगे. भारत और पाकिस्तान दोनो को ही अपने तरफ के भाग को असैनिक क्षेत्र बनाना पड़ेगा. बिना किसी तीसरे राज्य की अनुमति के भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर सैनिकों का जमावड़ा नहीं कर सकेंगे. इस बात की संभावना हो सकती है लेकिन कोई भी फार्मूला इसका पूरा हल नहीं पेश कर सकता, लेकिन बहुत से फार्मूले आकर्षक हैं.

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