पूरब की ओर देखो नीति का रोडमैप
भारत की पूरब की ओर देखो नीति से इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धता आ सकती है
सत्यजीत मोहंती, दिल्ली
दिसंबर २००५ में भारत-आसियान और पूर्वी एशिया सम्मेलन में भारत को उस समय बड़ी राजनयिक जीत हासिल हुई जब इसकी पूरब की ओर देखो नीति का रोडमैप और अखिल एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र के दृष्टिकोण को तरजीह दी गई तथा राजनेताओं व विद्वानों द्वारा इसे काफी सराहा गया.
देश की इस राजनयिक उपलब्धी को इस प्रकार समायोजित करना चाहिए ताकि इस विचार को और ऊंचे स्तर तक ले जाया जा सके. पूरब की ओर देखो नीति की शुरूआत १९९१ में हुई और यह दूसरे दशक में पहुंच चुकी है. इस उपलब्धी को हमेशा आगे रखना चाहिए ताकि २०१० तक इसके उद्देश्यों को पूरा किया जा सके.
भारत का पूरब के देशों के साथ समझौते के लिए चार विभिन्न स्तरों और मोर्चों की आवश्यकता है. पहले स्तर पर भारत को चीन के साथ तथा दूसरे स्तर पर कंबोडिया, लाओस, म्यांमार और वियतनाम (सीएलएमवी), तीसरे स्तर पर दक्षिण कोरिया और जापान तथा चौथे स्तर पर आसियान-५ के देशों-मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपिंस और सिंगापुर के साथ व्यापारिक संबंध बनाना होगा.
यह व्यवस्था चार विभिन्न मोर्चों, राजनीतिक, आर्थिक, रणनीतिक, और सांस्कृतिक स्तर पर होगा. इस स्तर पर प्रबंध में जब हम किसी खास देश से बातचीत कर रहे हैं तो सभी घेरों को पार करते हुए यह पूरे भौगोलिक क्षेत्र पर छा जाएगा.
भारत की आवश्यकता यह है कि वह चीन के साथ राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर द्विपक्षीय व बहुपक्षीय संबंध सुधारने में पूर्वी एशिया के देशों के साथ शक्ति संतुलन का संकेत देने से परहेज करे. दोनों ही देश संबंध सुधारने की दिशा में अपनी सीमाओं से जुड़े विवादों को हल करने तथा व्यापार को २००८ तक २० बिलियन यूएस डालर तक पहुंचाने का निश्चय किया है. दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को देखते हुए यह लक्ष्य कठिन नहीं है.
हांलाकि कुछ एशियाई ताकतें चाहती हैं कि भारत को चीन के बढ़ते प्रभावों के समानांतर अपने को खड़ा करना चाहिए. जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत और चीन को रणनीतिक प्रतिस्पर्धी के रूप में खड़ा किया है.
ठीक उसी तरह बीजिंग भी सकारात्मक रुख अपनाते हुए पूर्वी एशिया में आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास नहीं कर रहा है. यूरोप के अनुभव बताते हैं कि इसके क्षेत्रीय समंवय के लिए फ्रांस और जर्मनी के बीच अधिकतम शक्ति विन्यास आर्थिक आवश्यकताओं को देखते हुए हुआ था. मनमोहन सिंह का अखिल-एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र की संभावना, भारत और चीन के बढ़ते व्यापारिक व आर्थिक जरूरतों में व्यापार को बढ़ावा देगा.
समय आ गया है जब दोनो देश आपसी संबंधों को ऊर्जा आवश्यकताओं और बाजार में पहुंच जैसे डब्ल्यूटीओ के मामलों पर साझा रणनीति बनाएं. इस साल मणिशंकर अय्यर की चीन यात्रा ने ऊर्जा मोर्चे पर अच्छी शुरूआत की है. भारत और चीन इस बात पर सहमत हो गए हैं कि जब भी वे किसी दूसरे देश से तेल या गैस पर समझौता करेंगे तो सूचनाओं का आदान प्रदान करेंगे. इस प्रकार के सहयोगात्मक रवैये से विश्व के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोग करने वाले दो देशों की बिना किसी मूल्य प्रतिस्पर्धा के ऊर्जा सुरक्षा में वृद्धि हो सकेगी.
चीन और भारत को वस्तुओं और सेवाओं पर समझौते के लिए २००९ तक रोडमैप तैयार करना चाहिए जिससे सड़क मार्ग से ज्यादा से ज्यादा व्यापार हो सके. इस प्रकार का दृष्टिकोण चीन के आंतरिक भागों और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्रों को जोड़ने में मदद करेगा और पिछड़े इलाकों के विकास में भी सहायक होगा.
दूसरे स्तर पर भारत को कंबोडिया, लाओस, म्यांमार और वियतनाम के साथ राजनीतिक और आर्थिक सहयोग उसी तरह बढ़ाना होगा जिस तरह से गुजराल सरकार के कार्यकाल में दक्षिण एशिया के पड़ोसियों के साथ हुआ था. इन देशों के साथ भारत का आर्थिक और तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ाने में भी सहायक होगा.
भारत को शैक्षणिक, तकनीकी, सूचना प्रौद्योगिकी और फार्माक्यूटिकल क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता प्रदर्शित करना चाहिए ताकि सीएलएमवी देशों में सामाजिक व आर्थिक विकास को गति मिल सके. सीएलएमवी देशों में म्यांमार का सामाजिक आर्थिक विकास भारत के रणनीतिक पहलू से काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत से लगी उसकी विवादित सीमा है.

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