दिल्ली में पसरा भ्रष्टाचार का मलवा

लोगों को झांसा देकर शहर में अवैध निर्माण कराने वाले बिल्डर माफियाओं पर लगाम कसने की जरूरत है

संजय कपूर
दक्षिण दिल्ली में एक सड़क की तरफ जैसे ही मुड़ते हैं एक टूटी फूटी बिल्डिंग दिखाई देती है. उसे देखने से ऐसा लगता है जैसे गलती से कोई बम उसके ऊपर गिरा दिया गया है. बिल्डिंग जो गिराई गई है उसके बिल्डर पर कुछ स्थानीय नेताओं का भी हाथ था. वह म्यूनिसिपल अथारिटी की अवहेलना के अलावा मूर्खतापूर्ण तरीके से कालोनी के रेजीडेंट वेल्फेयर एसोसिएशन का भी विरोध किया जिसके कारण ये लोग काफी आहत महसूस कर रहे थे.

रेजिडेंट वेल्फेयर एशोसिएशन रिटायर्ड नौकरशाहों द्वारा संचालित हो रही थी और वे किसी मौके की तलाश में थे. एसोसिएशन ने कोर्ट से इसको गिराने का आर्डर ले लिया और वह नवनिर्मित ढ़ांचा ढ़हा दिया गया. इस घटना के कई साल हो गए लेकिन न तो अथारिटी और न ही बिल्डर ने इस बिल्डिंग के मलवे को साफ कराया.

दिल्ली में गैरकानूनी बिल्डिंगों को जगह जगह तोड़ फोड़ करने से पूरा शहर उजड़ा हुआ नजर आता है. यदि कोर्ट के आदेश से यह गिराया जा रहा है तो पूरा शहर ही बगदाद या काबुल की तरह दिखाई देना चाहिए जो कि आधुनिक बमों से तबाह हो गए हैं. एक स्थानीय नेता के अवैध बिल्डिंग की तस्वीर जब एक स्थानीय समाचार पत्र ने प्रकाशित की तो उनका कहना था कि "दिल्ली की अस्सी फीसदी संरचना अवैध है".

हांलाकि इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं द्वारा सताए गए ये लोग अवैध शहरी इलाकों में नए नियम चाहते हैं. इन धूर्त लोगों ने सोए हुए भ्रष्ट प्रशासन का भरपूर लाभ उठाया और बढ़ती जनसंख्या के निवास व कार्यस्थल की जरुरतों की अवहेलना की.

राजनीतिज्ञ, पुलिस और नगर पालिका के अधिकारी पैसों के लिए लोगों को आश्वासन दिया कि उनके अनधिकृत निर्माणों को अधिकृत कर दिया जाएगा. एचकेएल भगत जैसे दिल्ली के बड़े राजनीतिज्ञ लाखो लोगों को ट्रांस यमुना इलाके में अनधिकृत रूप से बसाया और उन्हें अपने वोट बैंक में बदला. यह खेल कई सालों तक चलता रहा. वोटिंग पावर के कारण कई बार वे चुनाव जीते और कालोनियों को अधिकृत करते रहे.

बहुत सारी पाश कालोनियों को सरकार की सहमति मिलने से यह संदेश गया कि इस मामले पर सरकार का रवैया काफी नरम है और वह सारे अनधिकृत कालोनियों को अधिकृत कर देगी. हांलाकि दिल्ली का सैनिक फार्म भी अनधिकृत रुप से बना हुआ है. तथ्य यह है कि यदि यह इतने सालों से बुल्डोजर से बचा हुआ है तो इसका मतलब है कि अभी भी कई ऐसी जगहे हैं जो अनधिकृत हैं फिर भी सही सलामत हैं.

अवैध शहरी निर्माणों की बाढ़ केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं है. लगभग हर बड़ा शहर इसकी चपेट में है. मुंबई, कोलकाता, बंगलौर जैसे बड़े शहर शहरी दुःस्वप्न की तरह हो गए हैं जहां सड़कों पर गड्ढ़े, कूड़ा करकट और सीवेज का निस्तारण अच्छा नहीं है. यहां पीने का स्वच्छ जल और विद्युत सप्लाई का कोई पता नहीं है.

पिछले साल मुंबई और फिर बंगलौर में पहली बरसात शहरी दुःस्वप्न का नमूना था. मुंबई में तो यह प्रलय की बाढ़ की तरह था जिससे पूरा जीवन समाप्त हो जाता. बंगलौर जो कि भारत की सूचना प्रौद्योगिकी की राजधानी है और वहां बारिश ने उद्योगपतियों और राजनीतिज्ञों के बीच मतभेद पैदा कर दिया.

नारायणमूर्ती और किरण मजूमदार जैसे उद्योगपतियों ने बुनियादी संरचना पर ध्यान न देने के लिए सरकार की आलोचना की और धमकी दी कि यदि वे अपने को इससे उपर नहीं उठाते तो वे अन्य राज्यों की तरफ मुख करेंगे.

शहर के ढ़ांचे के नवनिर्माण का कार्यक्रम बहुत सालों से चल रहा था लेकिन प्रकृति के क्रोध ने इसे पूरी तरह धो दिया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फरवरी २००५ में ३० बिलियन डालर की जवाहर लाल नेहरू नगरीय नवनिर्माण नामक महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की जिसका उद्देश्य पुराने शहरों का पुननिर्माण और उसको गुणवत्तायुक्त बुनियादी ढ़ांचा प्रदान करना था.

नवनिर्माण तब तक संभव नहीं है जब तक कि इसका पुराना ढ़ांचा, झुग्गी बस्तियां और अवैध निर्माण ढ़हाए नहीं जाएंगे. पुराने शहर जो विस्फोटक स्थिति का सामना कर रहे हैं उनको यदि अपने नागरिकों को गुणवत्तायुक्त जीवन प्रदान करना है तो शहरों का पुनर्निर्माण जरूरी है.

वाम दलों ने इस महात्वाकांक्षी योजना के पीछे किसी तीसरे के हित में काम करने का आरोप लगाया है. उनका आरोप है कि शहर के पुनर्निर्माण के पीछे अमेरिका के तर्ज पर झुग्गी झोपड़ी को गिराकर पुनर्निर्माण के नाम पर वे विद्युत और जल का निजीकरण करना चाहते हैं.