यूपीए सरकार की दुविधा

 

एक सर्वेक्षण पर दिल्ली के राजनीतिक हलकों में इस बात की अटकलें तेज हो गई हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और वाम दलों के बीच कोई समझौता है. वियना में भारत को ईरान के खिलाफ वोटिंग के लिए अमेरिकी दबाव और असैनिक व सैनिक परमाणु रिएक्टरों को अलग-अलग करने के लिए परमाणु समझौता और निगरानी के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी को सौंपने से उपजे तनाव को ये अधिक समय तक नहीं सहन कर सकते हैं.

आखिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का वाम दलों के साथ सुखद क्षण इतना जल्दी क्यों समाप्त हो गया? भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने यह स्पष्ट कर दिया कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का ईरान मसले को सुरक्षा परिषद में ले जाना और परमाणु कार्यक्रम पर रवैया, राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम से हटकर एक स्वतंत्र रणनीति है.

वाम दलों का विश्वास है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार अमेरिका के दबाव के सामने झुक गयी है और उसने चेतावनी दी है कि यदि वह राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम के रास्ते से भटकती है तो वह समर्थन वापस ले सकता है. भारत में अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड के निर्देशों से भी वे काफी नाराज हैं.

सीपीआइ (एम) अब तक केवल कोरी धमकी ही देती रही है. यह कभी भी अपने चेतावनी पर कायम नहीं रहती. हाल ही में उसने हवाई अड्डों के निजीकरण पर कार्यवाही की चेतावनी दी लेकिन कुछ प्रदर्शनों के बाद वह नरम पड़ गई. बुनियादी सवाल यह है कि कब तक वे यूपीए पर वार करने की पहेली बुझाते रहेंगे.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि सीपीआइ (एम) की अपनी कुछ मजबूरियां हैं. जमीनी सत्यता यह है कि पश्चिम बंगाल और केरल में चुनाव होने हैं और इसके बहुत सारे संसद सदस्य इन राज्यों से चुनकर आए हैं. पार्टी के नेतृत्व को भ्रमित कैडरों से विरोध का सामना करना पड़ रहा है और वे उनके यूपीए विरोधी रवैये को समझने का प्रयास कर रहे हैं. दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है लेकिन वे केवल भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर रखने के लिए केंद्र में पूपीए सरकार को समर्थन दे रही हैं.

यदि कैडर के लोग इसी तरह भ्रमित रहे तो सीपीआइ (एम) को चुनाव प्रचार में दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा. यद्यपि चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दे भारी पड़ेंगे और दोनो ही पार्टियों के समर्थक यह समझेंगे कि केंद्र में वे गले मिल रही हैं इसलिए वे एक दूसरे पर दोषारोपण नहीं कर पाएंगे. यह रवैया केरल में ज्यादा नुकसानदायक होगा जहां कांग्रेस इसे कड़ी चुनौती दे रही है लेकिन पश्चिम बंगाल में कम क्योंकि वहां यह अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है.

इतना सब कुछ होते हुए भी कम्युनिस्ट पार्टी केंद्र में अपनी पकड़ ढ़ीली नहीं होने देना चाहती क्योंकि अपने इतिहास में पहली बार वह केंद्र की सत्ता में भूमिका निभा रही है. पार्टी के सचिव प्रकाश कारत और समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच चल रही बातचीत से तीसरे मोर्चे के संकेत मिलते हैं.

लेकिन इसके बाद उनके पास विकल्प क्या हैं? अमेरिकी विरोधी रवैया और उदारीकरण के विरोध के नाम पर तीसरे मोर्चे का उदय हो रहा है. करात के वक्तव्यों के अलावा वे लोकसभा चुनाव साथ साथ लड़ना चाहते हैं और इसका प्रमाण है कि यूपीए सरकार को अस्थिर करने की कोशिश जारी है. सत्ता में बैठी कांग्रेस सरकार अपने सहयोगियों के खिलाफ षड़यंत्र रच कर उन्हें लगातार अपमानित कर रही है इसलिए भी वे चाहते हैं कि यह सरकार जल्द से चली जाए. वे सरकार को सहयोग नीजी कारणों से दे रहे हैं और वे दिखाना चाहते हैं कि कांग्रेस की नीतियां सहयोगियों को किस तरह नुकसान पहुंचा रही हैं.

कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में लोगों के मन में संदेह पैदा हो रहा है और तमिलनाडु में डीएमके पर भी तीसरे मोर्चे में शामिल होने का दबाव है. ये पार्टियां समर्थन वापस लेने का दावा कर सकती हैं कि अमेरिका का ईरान पर रवैया अल्पसंख्यकों के हितों के खिलाफ है और इसकी निजीकरण की नीति भी नौकरी पेशे वाले वर्ग के हितों के विपरीत है. यूपीए सरकार के विपरीत माहौल खड़ा करने के लिए ये सभी पर्याप्त कारण हैं.

यह निश्चित है कि, कांग्रेस भी इन सब बातों से अनभिज्ञ नही है. ऐसे बहुत सारे मामलों पर कांग्रेस के बड़े नेताओं और मध्यम वर्ग के नेताओं के बीच बढ़ रही खाई पार्टी के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है. कांग्रेस में विभाजन जो दिखाई नहीं दे रहा है वह सरकार की स्थिरता के लिए घातक है. मार्च में अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा पर यह स्पष्ट होगा कि यूपीए अपने सहयोगियों पर निर्भर करती है या बुश के रवैये पर.