वोट बैंक की राजनीति में ताक पर राष्ट्रीय सुरक्षा

मुलायम सिंह यादव के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की बजाय घरेलू नीतियां ज्यादा महत्वपूर्ण हैं

विजय सांघवी
पहली बार भारतीय संसद के सामने यह सवाल आया कि किसी विदेश मामले पर चाहे वह राजनीतिक हो या धार्मिक उस पर वीटो पावर दिया जा सकता है या नहीं. यह वक्तव्य भारत द्वारा ईरान पर वोट के समय राजनीतिक पार्टियों द्वारा संसद में उठाया गया. समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो इस मामले पर चतुराई से काम ले रहे हैं. वे ईरान वोट के विरोध के नाम पर मुस्लिम समुदाय के हाथ में वीटो पावर देना चाहते हैं जो उनके वोट बैंक हैं.

सुरक्षा परिषद से इस मामले को हटाकर वे कुछ कारणों से एक महत्वपूर्ण हथियार को ईरान और खासकर मुस्लिम समुदाय को सौंपना चाहते हैं. यदि वे भारत को मतदान से रोक लेते हैं तो वे न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में मुस्लिमों के मसीहा बनकर उभरेंगे.

मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में चुनावों के समय मुस्लिमों का तगड़ा समर्थन चाहते हैं. अघोषित स्तर पर वाम पार्टियां भी अपने चुनावी वर्ग का ख्याल रखते हुए सहयोगी की भूमिका मे हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में सावधानीपूर्वक इस मामले पर वक्तव्य दिया कि भारत के कदमों के विरोध से सांप्रदायिक होने का संदेश जाएगा. अपने वक्तव्य में वे इस खतरे की ओर संकेत कर रहे थे कि पड़ोस में एक देश हथियारों का जखीरा इकट्ठा कर रहा है जिसे एक पड़ोसी का समर्थन है. पाकिस्तान और चीन पहले से ही परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और इस सूची में एक और नाम जुड़ना भारत के परिप्रेक्ष्य में अच्छा नही है. पार्टी के सदस्यों और वाम दलों के साथ एक मीटिंग में उनके बुद्धिमत्तापूर्ण वक्तव्य से लगता है कि उनके पास बताने के लिए इससे भी ज्यादा कुछ है जो वे बांटना नहीं चाहते.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का कहना है कि भारत अपने पारंपरिक मित्र, जिसने १९७२ में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के समय हमारी मदद की उसके खिलाफ मतदान करना भारत के मुस्लिमों की भावनाओं को आहत कर सकता है. ये सारी बातें मार्च में भारत द्वारा वोटिंग के समय प्रतिरोधक के तौर पर कार्य करने चाहिए.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुलायम सिंह ने बजट सत्र में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा की.

वाम दलों को एक तो केंद्र में यूपीए सरकार को समर्थन देने तथा दूसरा अपने कैडर को इस मसले पर समझौता करने के लिए स्पष्टीकरण देना होगा. दूसरा कारण जो सामने है वह वाम दलों के गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल में होने वाला चुनाव है जहां मुस्लिम समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका में है.

भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व ईरान पर भारत के मतदान को अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण माना. हांलाकि जब संघ परिवार ने ईरान के परमाणु मसले पर मनमोहन सिंह का समर्थन किया तो भाजपा को भी अपने निर्णय की समीक्षा करनी पड़ी और इस बात पर सहमत हुआ कि पड़ोस में परमाणु शक्ति का उभरना भारत के हित में नहीं है लेकिन मनमोहन सिंह सरकार जिस तरीके से इस पर मतदान कर रही है वह दोषपूर्ण है.

हांलाकि मुलायम सिंह यादव वाम दलों के साथ जो कुछ भी करना चाहते हैं वह मुस्लिम समुदाय की निंदा के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि उनके अनुसार भारतीय मुस्लिम समुदाय इसलिए आहत होगा क्योंकि ईरान एक मुस्लिम देश है.

इसमें तर्क यह है कि क्या भारतीय मुश्लिम भारत की सुरक्षा की बजाय ईरान को एक मुस्लिम समुदाय होने के नाते समर्थन देंगा.

केंद्रीय कक्ष में एक नेता का कहना था कि आप भारत के मुसलमानों को बेवकूफ क्यों बनाते हैं? क्या वे इतने भोले हैं कि इतना भी नहीं समझ सकते कि जो परमाणु बम इस्लामिक देश द्वारा विकसित होगा वह केवल मुसलमानों को ही मारेगा, अन्य को नहीं?

मनमोहन सिंह सरकार को अगले महीने होने वाले अविश्वास प्रस्ताव से कोई खतरा नहीं है. सरकार का चलना बीजेपी पर निर्भर करता है यदि वह पर्याप्त संख्या जुटा लें. इससे यह पता चलता है कि कैसे विभाजित मानसिकता बड़े मसले को किनारे कर देती है. संसद को ऐसे मसले पर अपनी वीरता के प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. यह अधिक समय तक थिएटर नहीं रह सकता जहां राजनीतिज्ञ राष्ट्रीय हित में अनौपचारिक बहस द्वारा समस्याओं का समाधान तलाशते हैं.