"समय तय करेगा यूपीए सरकार की जागरुकता"
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मणिक सरकार से हार्डन्यूज की खास बातचीत
आशीष बिश्वास, कोलकाता
भारतीय राज्य त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मणिक सरकार से बातचीत में केंद्र में सत्ताशीन कांग्रेस सरकार के साथ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मूलभूत द्वंद्व को आसानी से समझा जा सकता है. हार्डन्यूज से खास बातचीत में सरकार तीन विभिन्न मुद्दों पर जोर देते हैं जिसमें त्रिपुरा व पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के आर्थिक विकास में केंद्र की भूमिका, त्रिपुरा द्वारा काफी समय से की जा रही मांग की उपेक्षा तथा दिल्ली का केवल बांग्लादेश से चलाए जा रहे अलगाववादी विद्रोह के खिलाफ सहयोग करना शामिल है.
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के सहयोगी पार्टी के एक नेता से जैसा उम्मीद की गई थी वैसा कुछ भी सुनने को नहीं मिला. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुद्धदेव भट्टाचार्या द्वारा वाम दलों के विरोध पर अमेरिकी सेनाओं को कलाईकुंडु सैनिक बेस पर युद्धाभ्यास की अनुमति दी, तभी से कांग्रेस और वाम दलों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण चल रहे हैं. इसी तरह दिल्ली और मुंबई के हवाई अड्डों के निजीकरण ने भी दोनों के बीच दूरियां बढ़ा दी हैं.
पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों की यह सब भूमिका है जहां सीपीआई (एम) और कांग्रेस एक दूसरे के कड़े विरोधी हैं. दोनों ही राजनीतिक दलों को यह बताने में कठिनाई होगी कि राज्य स्तर पर क्यों वे एक दूसरे के विरोधी और केंद्र में सहयोगी की भूमिका में हैं. त्रिणमूल कांग्रेस के इस आरोप को झुठलाना कठिन है कि दोनों पार्टियां विपक्ष के छोटे दलों पर निशाना साध रही हैं.
त्रिपुरा की सरकार इस पर संभलकर कदम रख रही है. राज्य का आर्थिक विकास सकारात्मक है तथा प्राकृतिक गैसों का पर्याप्त भंडार और अपहरण की घटनाओं में कमी आ रही है. उनसे बातचीत के कुछ अंश..
त्रिपुरा में कानून व्यवस्था के क्या हालात हैं?
त्रिपुरा में चोरी या डकैती जैसे सामान्य अपराध कभी समस्या रहे ही नहीं हैं. हांलाकि अलगाववाद के लिए चल रहा संघर्ष इससे अलग है. मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि धीरे-धीरे यहां बदलाव हो रहा है. अपराध की संख्या में कमी हो रही है. अपहरण की घटनाओं में काफी कमी हो चुकी हैं और एनएलएफटी और एटीटीएफ जैसे अलगाववादी संगठनों के लोगों ने बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण किया है. जबरन वसूली की घटनाओं में भी कमी आई है.
त्रिपुरा में प्रतिवर्ष अपहरण की १,२०० घटनाएं होती हैं. इस समय क्या हालात हैं?
मुझे इसका सही आंकड़ा तो नहीं मालूम है लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि हम बहुत से लोगों को बचाने में कामयाव हुए हैं जो पहले नहीं हो पाता था. इसका यह प्रमाण है कि सूचना तंत्र बेहतर हो रहा है तथा हमें लोगों का ज्या सहयोग मिल रहा है. इसके कारण अलगाववादी ताकतें कमजोर पड़ रही हैं.
अलगाववाद से लड़ने में क्या केंद्र का सहयोग मिल रहा है?
हमें केंद्र का बेहतर सहयोग मिल रहा है. बांग्लादेश से लगी हमारी ८५६ किलोमीटर की सीमा है जिसमें ५०० किलोमीटर तक सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा हो चुका है और जल्द ही यह कार्य पूरी सीमा पर कर लिया जाएगा. हम आम लोगों व सुरक्षा सेनाओं के बीच बेहतर सहयोग से अलगाववाद का मुकाबला कर रहे हैं.
बांग्लादेश के बारे में क्या कहेंगे?
अब यह आम हो चुका है कि अलगाववादी तत्व संघर्ष के लिए बांग्लादेश की सीमाओं का उपयोग कर रहे हैं. वहां के चित्तगांग और अन्य इलाको में बहुत से अलगाववादी कैंप संचालित किए जा रहे हैं. इसके बारे में जगजाहिर है लेकिन ढ़ाका हमेशा ही इससे इनकार करता है. क्या हम इतने अनुभवहीन हैं कि उनकी इस बात को स्वीकार कर लेंगे.
बांग्लादेश का कहना है कि भारत द्वारा जो सूचना दी जा रही है वह सरासर गलत है?
यह इतना आसान नहीं है. मैने उन कैंपों के स्थानों, अलगाववादी आंदोलन, हथियारों की खरीद फरोख्त की भारत सरकार को जानकारी दी थी. सरकार ने यह जानकारी बांग्लादेश को दी थी.

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